श्री ओ पी रावत
मुख्य चुनाव आयुक्त
भारत।
महोदय ,

देश में चुनाव का माहौल पूरे जोर पर है। पांच विधान सभाओं के चुनावों के तुरंत बाद लोक सभा के चुनाव होने की प्रक्रिया शुरू हो जायगी। देश में निष्पक्ष चुनाव हो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। चुनाव आयोग का एक दाग रहित इतिहास है जिसने दुनिया में भारत को लोकतान्त्रिक देशो की कतार में अग्रिम पंक्ति में जगह दिलाई है। आने वाले समय में भी आपकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहने वाली है। हम भारत के १३५ करोड़ लोगो की इच्छा और आकांछा पर आपका खरा उतरना निश्चित है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह के निर्णय चुनाव आयोग ने किये है उससे इस संस्थान के प्रति आम आदमी का विश्वास और बढ़ा है। आयोग के द्वारा लिया गया निर्णय " चुनाव उम्मीदवारों को अपना अपराधी वृत्त तीन बार अख़बार और दूरदर्शन में प्रसारित करना आवश्यक होगा" निश्चित ही एक मील का पत्थर साबित होगा।

निष्पक्ष चुनावो के लिए एक और अत्यंत महत्व पूर्ण बिंदु है कि जो वायदे चुनाव में किये जाये उन्हें यथा सम्भव जीतने वाले दलों द्वारा पूरा किया जाये। कुछ ऐसे वादे जो पूरे नहीं हो पाये उनका अगले चुनाव घोषणा पत्र में जिक्र हो और उसके पूरा न हो पाने के कारण विस्तार से बता देना आवश्यक किया जाना चाहिए। ताकि आम आदमी को यह पता लग जाये की जो वायदे किये गए थे उन्हें कार्यान्वित करने की कोशिश की गयी या नहीं और वह अगले चुनावों के बाद कार्यान्वित किये जायँगे अथवा नहीं।
हर चुनाव में कुछ ऐसे वादे किये जाते है जिनका सीधा सम्बन्ध अर्थ से अर्थात रूपये खर्च करने से होता है।इस तरह के वायदों को पूरा करने के लिए आवश्यक है की इनका प्राविधान बजट में हो। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश बीजेपी ने कहा है की बारहवीं पास करने वाली छात्राओं को स्कूटी दी जाएगी अथवा किसानो को दीर्घ कालिक ऋण ब्याज मुक्त होंगे इत्यादि। इसी तरह कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र कहा है की किसानो का कर्ज सरकार बनने के दस दिनों के अंदर माफ़ होगा और नवयुवकों को रोजगार देने वाले उद्यमों को वेतन अनुदान दिया जायेगा। केवल स्कूटी दिए जाने के वायदे के लिए कम से कम पांच सो करोड़ रुपये (१00000 X ५0000 =५00,00,00,000 ) किसानो का कर्ज माफ़ करने के लिए प्रति किसान 2,00,000 रुपये के हिसाब से एक लाख किसानो का कर्ज माफ़ करने के लिए दो हजार करोड़ की आवश्यकता होगी। क्या मध्य प्रदेश की सरकार वास्तव में इस खर्च को उठा पायेगी और इसके लिए किन लोगो पर और कितना टैक्स लगाया जायेगा?
ऐसे लोकलुभावन वायदे जनता को वोट देने के लिए राजनैतिक दलों द्वारा हर चुनाव में किये जाने की एक लम्बी परम्परा देश में बरसो से चली आ रही है। इन वायदों से जिनको दिया जाने का वायदा किया जा रहा है उसका तो जिक्र है लेकिन इन खर्चो को पूरा करने के लिए जो धन जुटाया जायेगा उसे किस तरह के कर लगा कर किन लोगो से वसूला जाएगा इसका कोई भी उल्लेख नहीं होता। अतः जिन्हे मिलना है उन्हें तो पता है की अमुक पार्टी जीतने पर यह देने वाली है किन्तु जिनसे वसूला जायेगा उन्हें नहीं पता की इसकी कितनी कीमत उन्हें चुकानी है और उसका विरोध करना चाहिए अथवा समर्थन । इस तरह एक पक्षीय बाते करके चुनाव जितने की परम्परा खतम की जानी चाहिए। इसे नियम को भी निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाये।
अच्छा हो कि चुनाव आयोग घोषणा पत्र का एक प्रारूप सभी दलों के साथ बैठ कर तय करे जिसमे निम्न बिंदु दिया जाना आवश्यक हो :
१. पिछले घोषणा पत्र का पुनरावलोकन। क्या वादे किये गए क्या पूरे हुए। जो नहीं पूरे हुए उनका कारण। अगले चुनाव के बाद उनके पूरा किये जाने की सम्भावना।
२. समाज को समृद्ध करने वाली योजनाएं : इसमें महिलाओं ,किसानो, नवयुवकों इत्यादि के लिए चलायी जाने वाली योजनाओं की जरुरत क्यों है ,योजनाये कैसे चलेगी,उनसे सम्बंधित लोगो को क्या लाभ मिलने की संभावनाएं , अनुमानित लागत और उस व्यय को करने के लिए की जाने वाली व्यवस्था।
३. समाज के समृद्ध लोगों के लिए योजनाए :जो लोग आर्थिक सम्पन्न है उनके लिए सरकार क्या योजनाए लाने वाली है और उन्हें क्या और किस तरह से लाभ होगा।
४. अन्य साधारण योजनाए : सरकार आने पर अन्य क्या योजनांए लागू की जाएँगी जिससे समाज के सभी लोगो को लाभ मिले और जीवन स्तर बेहतर हो सके।
उपरोक्त दिए हुए बिंदु केवल ध्यानाकषर्ण के लिए है इन्हे और विस्तार से बनाना सम्भव है। ताकि राजनैतिक दलों द्वारा की जाने वाली घोषणाएं केवल आकर्षक ही नहो बल्कि ज्यादा सार्थक भी हो सके। और चुनाव घोषणा पत्र केवल लोक लुभावन वादों का एक पुलिंदा और महज एक शिष्टाचार बनकर न रह जाये। इस तरह का नियम चुनावी रैलीयों में मनमाने तरीके से की जाने वाली घोषणाओं पर भी रोक लगाएगी । इस तरह चुनाव हो जाने के बाद किसी को यह कहने का भी अवसर नहीं मिलेगा की यह तो चुनावी जुमला था और न यह की हमने तो चुनाव जीतने के लिए घोषणा कर दी थी लेकिन यह विश्वास नहीं था की जनता इन पर यकीन करके चुनाव जिता देगी।
अजय सिंह "एकल"
अन्त में
जो परेशानियाँ कामयाबी का हिस्सा बन जाती है
बाद में वही मुश्किलें कामयाबी का किस्सा बन जाती है