Monday, December 24, 2018

किसानो की कर्ज माफ़ी : विकल्प क्या है ?

दोस्तों,

किसानो की कर्ज माफ़ी का वादा करके कांग्रेस ने हाल  में हुऐ तीन राज्यों में चुनाव जीत लिया है। सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री कर्ज माफ़ी के  वादे को  पूरा करने की कोशिश  करते हुए भी दिख रहे है। किन्तु उन्हें पता है राज्यों के लिए यह आसान नहीं है। देश में अर्थशास्त्रीयों जिसमे पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से लगा कर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और योजना आयोग के अरविन्द पनघड़िआ तक शामिल है।  लेकिन चिंता यही ख़तम नहीं हो गयी है। असल में तो चिंता अब शुरू हुई है। अगले छै महीने में आम चुनाव होने वाले है। यह चुनाव दोनों प्रमुख दलों यानि कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। पार्टियों के नीत कार किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने की तैयारी करंगे। फिर इसमें होड़ लगेगी कर्ज माफ़ी की ,बेकारी भत्ता देने की  और देश हित को किनारे रख कर अन्य प्रलोभन देने की। इसका नकारात्मक प्रभाव देश की अर्थव्यस्था पर पड़ेगा  यह जानते हुए भी चुनाव किसी भी कीमत पर जीतना है इसलिए दूसरे दल के मुकाबले ज्यादा से ज्यादा देने की घोषणा की होड़ लगने वाली है। सवाल यह है की किसान के हालत को बेहतर करने का विकल्प क्या है।

हम सब जानते है कि देश में आधी आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर है। पिछले सत्तर सालो में हमारे नीत नियंताओं की वजह से  कृषि की हालात ऐसे हो गए है की खाना हर कोई चाहता है लेकिन उगाना कोई नहीं चाहता। दूसरे व्यसायों की तरह जैसे डाक्टर अपने बच्चो को डाक्टर और वकील अपने बेटे को वकील बनाना
चाहता है किन्तु  किसान अपने बच्चो को किसानी करने के लिए उत्साहित नहीं करता। कारण ज्यादा मेहनत ,कम मुनाफा ,प्रकृति के ऊपर निर्भरता तो स्वाभाविक है लेकिन खाद और पानी के व्यापारिओं  और बिचौलियो ने कुल मिलाकर इसे न करने योग्य व्यसाय बना दिया है। इसलिए किसान का बेटे के लिए किसानी जीविका का आखरी उपाय है। यहाँ तक की किसान अपनी जमीन गिरवीं रख कर या बेच कर भी अपने बेटे को शहर में नौकरी करने के लिए भेजने में ही गर्व भी महसूस करता है और मानता है की सुरक्षित भविष्य का यही तरीका है।     

देश में कृषि की इस दशा के लिए जिम्मेदार कोई भी हो इसको ठीक करने की ,किसानो को सम्मान जनक आर्थिकस्तिथी के लिए अनुकूल वातावरण बनाना हमारी जिम्मेदारी है। कर्ज माफ़ी ,एमसपी जैसे उपाय सामायिक राहत तो दे सकते है किन्तु स्थाई समाधान के लिए हमें थोड़ा गहराई में जा कर योजना का क्रियान्वन करना होगा। योजना बनाने में जो लोग क्रियान्वन करने वाले है उनका सक्रिय सहयोग लेना आवश्यक है,दल  हित के बजाय देश हित में क्या ठीक है यह सोच रखनी पड़ेगी। इसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है की कोई एक नुस्खा पुरे देश में लागू नहीं हो सकता है इसे स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से संशोधित करना पड़ेगा। योजना में आवश्यक सुधार समय की अनुभव और मांग के अनुसार किया जा सके इसका भी प्रावधान हमें करना होगा। यानी नीतिओंमें इतना लचीलापन चाहिए ताकि अनावश्यक प्रशासनिक बाधाएं काम को रोक न सके।

इतना सब कुछ करके हम किस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते है ? मेरे विचार में कृषि क्षेत्र को निम्न लक्ष्य रखना ठीक रहेगा :

१.  देश की आवश्यकता के लिए पर्याप्त उपज प्राप्त करना। 
२.  निर्यात योग्य  गुड़वत्ता   के  कृषि उत्पादों का उत्पादन एवं निर्यात। 
३. कृषि को व्यसायिक तरीके से करना तथा किसानो को उनकी भागीदारी के अनुपात में मुनाफे में हिस्सेदारी सुनिश्चित करना। 
४.गांव के नवयुवकों के लिए रूचि एवं क्षमता के अनुसार स्थानीय व्यसाय के अवसर उपलब्ध करवाना। 
५.गावँ में पर्याप्त भौतिक साधनों की उपलब्धता पलायन रोकने में सहायक होगी। 

इन लक्ष्यों की प्राप्ति तथा गावं की सर्वांगीण विकास के लिए समाज के सभी वर्गों का सहयोग अपेक्षित है। आखिर स्वास्थ्य वर्धक भोजन सभी की मूल आवश्यकता है तो हम इसे कुछ लोगो की इच्छा पर कैसे छोड़ सकते है।  समयबद्ध तरीके से प्रयास करके इस लक्ष्यों को प्राप्त करना सम्भव है आवश्यकता है तो खुले दिमाग से विचार करने की ,व्यक्तिगत स्वार्थो से ऊपर उठ कर ईमानदार कोशिश करने की। आगे हम विभिन्न मॉडलों पर विचार करेंगे।

अजय सिंह "एकल"
  



Wednesday, December 19, 2018

किसानो की कर्ज माफ़ी:चींटी से बचने के लिए चीते को निमंत्रण

 दोस्तों ,
पिछले हफ्ते पाँच राज्यों में चुनाव सम्पन्न हो गये। इसमें तीन हिन्दी भाषी राज्यों मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीस गढ़ में कांग्रेस की विजय हुई है। इस विजय के पीछे  मध्यप्रदेश और छत्तीस गढ़ में जीत का एक कारण तो है पिछले पंद्रह सालों से राज्य कर रही बीजेपी को बदल कर दूसरी पार्टी का शासन  लाने  की चाहत यानी शासन में  बदलाव। बदलाव की चाहत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है हालांकि यह आवशयक नहीं की बदलाव हमेशा अच्छे के लिए ही हो तो भी बिना बदलाव के तुलना संभव नहीं और तुलना करना हमारे मन का एक खास गुण है अतः जनता के द्वारा पंद्रह सालो का शासन बदले जाने को एक सामान्य प्रक्रिया   माना जा सकता है।  यही कारण राजस्थान में भी रहा। हालांकि राजस्थान में बीजेपी ने केवल पाँच वर्षो का एक ही सत्र पूरा किया फिर भी कांग्रेस का जीतना केवल बदलाव की चाहत का परिणाम है।  

लेकिन दूसरा बड़ा कारण  रहा कांग्रेस पार्टी के  चुनाव घोषणा पत्र में सरकार आने के दस दिन के भीतर किसानो का ऋण माफ़ करने की घोषणा। इसने सरकार बदले जाने की आकांछा को और प्रबल कर दिया। नतीजा तीनो राज्यों में   कांग्रेस की सरकार बन गयी। वादे के मुताबिक सरकारों ने कर्जमाफी की घोषणा करनी शुरू कर दी है। यह अलग बात है की इसको अमली जामा पहनाना आसान नहीं है। और इसका अर्थव्यवस्था पर कितना ख़राब  असर पड़ेगा इसका आकलन करने में भी काफी समय लगने वाला है।  कर्ज माफ़ी की घोषणा के पक्ष और विपक्ष में अर्थशास्त्रियों खास कर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन,अरविन्द पनगडीहा जैसे लोगो के बयान आये है और टीवी से लेकर अखबारों तक में इस पर बहस छिड़ी है। मजे की बात यह है की देश में यह न तो पहली बार हुआ है और न केवल कांग्रेस ने ऐसी घोषणा करके चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने भी ऐसा ही वादा किया था ,फिर कर्नाटक के चुनाव जो  इसी साल मई में सम्पन्न हुये में भी  किसानो की कर्ज माफ़ी का वादा किया गया  था। यद्यपि छै महीने बीत जाने के बाद भी इसको कार्यान्वित नहीं किया जा सका है। लेकिन बहस इसलिए ज्यादा गंभीरता से शुरू हुई है क्योकि लोक सभा चुनाव अगले छै महीनो  में होने  वाले है। और  लोक सभा चुनाव में सभी पार्टियाँ इस अजमाये  नुस्खे का इस्तेमाल  जीतने के लिए करना चाहेंगी।

यह एक गंभीर समस्या है और इसका  परिणाम देश की अर्थव्यस्था को  भुगतना  पड़ेगा। यहाँ एक और प्रश्न विचार योग्य है की क्या केवल किसानों की कर्ज माफ़ी ही एक ऐसा चुनावी  वादा है जो देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पंहुचा रहा है, जवाब है  नहीं, बल्कि जितने भी ऐसे चुनावी वादे किये जाते है जिसमें  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  रूप से सरकार द्वारा पैसा खर्च किया जाता है, ज्यादातर ऐसे होते है जो कि अर्थव्यवस्था के लिए अल्पावधि अथवा दीर्घावधि में नुकसान दायक ही होते है।ऐसा कभी सामाजिक समीकरण के नाम पर किया जाता है कभी किसी वर्ग विशेष की भलाई के नाम पर।   लेकिन ऐसे खर्च क्योकि तत्कालिक लाभ को ध्यान में रख कर किये जाते है अतः इसके बारे में ज्यादा विवेचना नहीं होती है और परिणामस्वरूप यह किसी न किसी रूप में नुकसानदेय साबित होते है। 

अजय सिंह "एकल"





Monday, November 26, 2018

चुनाव आयोग के नाम खुला पत्र



श्री ओ पी रावत

मुख्य चुनाव आयुक्त

भारत।


महोदय ,


देश में चुनाव का माहौल पूरे जोर पर है। पांच विधान सभाओं के चुनावों के तुरंत बाद लोक सभा के चुनाव होने की प्रक्रिया शुरू हो जायगी। देश में निष्पक्ष चुनाव हो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। चुनाव आयोग का एक दाग रहित इतिहास है जिसने दुनिया में भारत को लोकतान्त्रिक देशो की कतार  में अग्रिम पंक्ति में जगह दिलाई है। आने वाले समय में भी आपकी भूमिका बहुत  महत्वपूर्ण रहने वाली है। हम भारत के १३५ करोड़ लोगो की इच्छा और आकांछा पर आपका खरा उतरना निश्चित है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह के निर्णय चुनाव आयोग ने किये है उससे इस संस्थान  के प्रति आम आदमी का विश्वास  और बढ़ा  है।  आयोग के द्वारा लिया गया निर्णय " चुनाव उम्मीदवारों को अपना  अपराधी वृत्त तीन बार  अख़बार और दूरदर्शन में प्रसारित करना आवश्यक होगा" निश्चित ही एक मील का पत्थर साबित होगा। 


निष्पक्ष चुनावो के लिए एक और अत्यंत महत्व पूर्ण बिंदु है कि जो वायदे चुनाव में किये जाये उन्हें यथा सम्भव   जीतने वाले दलों द्वारा पूरा किया जाये। कुछ ऐसे वादे जो पूरे नहीं हो पाये उनका अगले चुनाव घोषणा पत्र  में जिक्र हो और उसके पूरा न हो पाने के कारण विस्तार से बता देना आवश्यक किया जाना चाहिए। ताकि आम आदमी को यह पता लग जाये की जो वायदे किये गए थे उन्हें कार्यान्वित करने की कोशिश की गयी या नहीं और वह अगले चुनावों के बाद कार्यान्वित किये जायँगे अथवा नहीं। 


हर चुनाव में कुछ ऐसे वादे किये जाते है जिनका सीधा सम्बन्ध अर्थ से अर्थात रूपये खर्च करने से होता है।इस तरह के वायदों को पूरा करने के लिए आवश्यक है की इनका प्राविधान बजट में हो।  उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश बीजेपी ने कहा है की बारहवीं पास करने वाली छात्राओं को स्कूटी दी जाएगी अथवा  किसानो को दीर्घ कालिक ऋण ब्याज मुक्त होंगे इत्यादि।  इसी तरह कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र  कहा है की किसानो का कर्ज सरकार बनने के  दस दिनों के अंदर माफ़ होगा और नवयुवकों को रोजगार देने वाले उद्यमों को वेतन अनुदान दिया जायेगा। केवल स्कूटी दिए जाने के वायदे के लिए कम से कम पांच सो करोड़ रुपये  (१00000  X ५0000  =५00,00,00,000 ) किसानो का कर्ज माफ़ करने के लिए प्रति किसान 2,00,000 रुपये के हिसाब से एक लाख किसानो का कर्ज माफ़ करने के लिए दो हजार करोड़ की आवश्यकता होगी। क्या मध्य प्रदेश की सरकार वास्तव में इस खर्च को उठा पायेगी और इसके लिए किन लोगो पर और कितना टैक्स लगाया जायेगा?  


ऐसे लोकलुभावन वायदे जनता को वोट देने  के लिए राजनैतिक दलों  द्वारा हर चुनाव में किये जाने की एक लम्बी परम्परा देश में बरसो से चली आ रही है। इन वायदों से  जिनको दिया जाने का वायदा किया जा रहा है उसका तो जिक्र है लेकिन इन खर्चो को पूरा करने के लिए जो धन जुटाया जायेगा उसे किस तरह के कर लगा कर किन लोगो से वसूला जाएगा इसका कोई भी उल्लेख नहीं होता। अतः जिन्हे मिलना है उन्हें तो पता है की अमुक पार्टी जीतने  पर यह देने वाली है किन्तु जिनसे वसूला जायेगा उन्हें नहीं पता की इसकी कितनी कीमत उन्हें चुकानी है और उसका विरोध करना चाहिए अथवा समर्थन । इस तरह एक पक्षीय बाते करके चुनाव जितने की परम्परा खतम की जानी चाहिए।  इसे  नियम को भी निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाये। 

अच्छा हो  कि  चुनाव आयोग घोषणा पत्र का एक प्रारूप सभी दलों के साथ बैठ कर तय करे जिसमे  निम्न बिंदु दिया जाना आवश्यक हो :

१. पिछले घोषणा पत्र का पुनरावलोकन।  क्या वादे किये गए क्या पूरे हुए। जो नहीं पूरे  हुए उनका कारण।  अगले चुनाव के बाद उनके पूरा किये जाने की सम्भावना। 

२. समाज को समृद्ध करने वाली  योजनाएं : इसमें महिलाओं ,किसानो, नवयुवकों इत्यादि के लिए चलायी जाने वाली योजनाओं  की जरुरत क्यों है ,योजनाये कैसे चलेगी,उनसे सम्बंधित लोगो को क्या लाभ मिलने की संभावनाएं , अनुमानित लागत  और उस व्यय को करने के लिए की जाने वाली व्यवस्था।   

३. समाज के समृद्ध लोगों के लिए योजनाए :जो लोग आर्थिक सम्पन्न  है उनके लिए सरकार क्या योजनाए लाने  वाली है और उन्हें क्या और  किस तरह से लाभ होगा।

४. अन्य साधारण योजनाए  : सरकार आने पर अन्य क्या योजनांए लागू की जाएँगी जिससे समाज के सभी लोगो को लाभ मिले और जीवन स्तर बेहतर हो सके। 


उपरोक्त दिए हुए बिंदु केवल ध्यानाकषर्ण के लिए है इन्हे और विस्तार से बनाना सम्भव है। ताकि राजनैतिक दलों  द्वारा की जाने वाली घोषणाएं केवल आकर्षक ही नहो बल्कि  ज्यादा सार्थक भी हो सके। और चुनाव घोषणा पत्र केवल लोक लुभावन वादों का एक पुलिंदा और  महज एक शिष्टाचार बनकर न रह जाये। इस तरह का नियम चुनावी  रैलीयों  में  मनमाने तरीके से की जाने वाली घोषणाओं पर भी रोक लगाएगी । इस तरह चुनाव हो जाने के बाद किसी को यह कहने का भी अवसर नहीं  मिलेगा  की यह तो चुनावी जुमला था और न यह की हमने तो चुनाव जीतने के लिए घोषणा कर दी थी लेकिन यह विश्वास नहीं  था की जनता इन पर यकीन  करके चुनाव जिता  देगी। 



अजय सिंह "एकल"



                                                                           
      अन्त में 

                 जो परेशानियाँ कामयाबी का हिस्सा बन जाती है 
                            बाद  में वही मुश्किलें कामयाबी का किस्सा बन जाती है 




  

Friday, May 25, 2018

मोदी के चार साल ,क्या है जनता का हाल

दोस्तों ,

देखते ही देखते मोदी सरकार के चार साल निकल गए और नये चुनावोँ  की दस्तक सुनाई देने लग गई है । पुराने खिलाडी नयी योजनाओं के साथ खेलने को तैयार हो रहे है। पिछली बार मोदी जी गुजरात से केंद्र में आये थे तो उनके व्यक्तित्व  के बारे में,सोचने और काम करने के तरीकों का  ज्यादा कुछ पता नहीं था। केवल एक बात जो जनता जानती थी वह था गुजरात में हुये दंगे और उनसे मोदी जी कैसे निपटे।  फिर समय समय हुए पर कुछ कोर्ट केस और उनके निर्णयों के बारे में राष्ट्रीय अख़बार और टीवी चैनलों के माध्यम से मिली सीमित जानकारी के आधार पर मोदी जी के बारे में जन भावना का निर्माण हुआ । क्योकि राष्ट्रीय स्तर पर खास जानकारी नहीं थी तो इसका  स्वाभाविक लाभ मोदी जी को मिला और अभूतपूर्व विजय श्री मोदी जी के नेतृत्व में  भाजपा को  प्राप्त हुई और पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बन गयी।   चारो और देश में ऐसा माहौल बना  मानो जनता की वर्षो पुरानी  मुराद पूरी हुई।  कुछ को लगा की बस अब तो रामराज्य आने वाला है इसलिए चाहे राम मंदिर निर्माण हो या पाकिस्तान से दो दो हाथ कर हिसाब चुकता करना हो सब सम्भव हो जायेगा। मोदी जी ने चुनाव में वह सारे वादे कर दिए जिनका जरा भी असर वोट पर पड़ने वाला था या पड़ सकता था। मसलन रोजगार ,बैंक एकाउंट में पैसे,सबका  साथ सबका  विकास इत्यादि इत्यादि। हालांकि मोदी जी को पता था की इतने वादे पूरे करना संभव नहीं फिर भी करो या मरो की  तर्ज इलेक्शन जितना ही एक मात्र उद्देश्य है इसलिए वादे करते चले गए।  और नतीजा अच्छा रहा।

मोदी जी के लाल किले पर दिए गए पहले भाषण से ही ऐसा लगा की देश की जनता की सभी मांगे धीरे -धीरे पूरी होनी शुरू हो जाएँगी। स्वछता अभियान, पाकिस्तान से दोस्ती ,अमरीका से लगा कर यु के  तथा अन्य महाशक्तियों के लोगो से मोदी जी दोस्ती गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा का दिल्ली आना सब कुछ बहुत जोरदार रहा। लेकिन उसी समय से विरोधिओं ने भी अपने ढंग से कमान सम्भाली और शुरू हुआ पुरुस्कार लौटने का सिलसिला। पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से खूब शोर मचा।  तमाम योजनाओ का शुभारम्भ किया गया। कांग्रेस सरकार राज्यों में हुए चुनावों में ेके के बाद एक हारती चली गयी। तो कभी इ वी एम् मशीन को दोष दिया गया कभी हिन्दू मुस्लिम कार्ड  खेला गया।    कुल मिला कर आशा निराशा से भरा पहला साल ख़तम हुआ।

दूसरे साल में भी पुरानी घटनाओं  के साथ मामला भारत विरोधी गतिविधियो की और बढ़ा इसमें जे एन यू की घटनाये    सबसे ज्यादा चर्चा में रही।  लेकिन यू पी और बिहार चुनाव के पहले नोट बंदी ने लोगो को हिला के रख दिया। आम आदमी जिसने दुःख सुख को एक जैसा मान कर जीने की आदत डाल ली थी और मान लिया था की सरकारे अमीरो के हित  में काम करती है एक नयी राह  दिख गयी और ऐसा लगा की मोदी सरकार अमीरो के खिलाफ भी कुछ कर सकती है। इसके पहले इंदिरा गाँधी ने जब बैंको का सरकारी करण किया था तो भी कुछ ऐसा महसूस हुआ था लेकिन उस घटना से प्रभावित होने वाले लोग काम थे। नोट बन्दी  ने तो गरीबो और अमीरों दोनों को हिला दिया लेकिन देश ने इसे काले धन के   खिलाफ एक बड़ी जंग मान कर सरका का भरपूर समर्थन किया।

एक देश एक टैक्स का नारा देकर मोदी सरकार ने पुरे देश में एक टैक्ससिस्टम लागू किया जी एस टी के माध्यम से।  और इसने एक बार फिर देश में व्यापार करने के ढंग को बदला और काले धन तथा टैक्स की चोरी को प्रभावित किया। धीरे धीरे देश की गाड़ी नयी पटरी पर चलने को तैयार हो गई। पुरानी सोच बदली और यह देश हमारा है हमें भी इसके लिए कुछ करना चाहिए का भाव जनता में आना शुरू हो गया। हालांकि इसमें सबकुछ ठीक हो गया कहना मुश्किल है लेकिन फिर भी चीजे बदली है और यह बदलाव देश से लगा कर विदेशो तक और विदेश में रह रहे भारतीयों ने भी महसूस किया। ब्रांड भारत दिखने लगा ,आर्थिक मोर्चे पर अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी जैसे स्टैण्डर्ड एंड पुअर इत्यादि ने अ
च्छी रैंकिग दी।














और अंत में 





Thursday, February 1, 2018

Union Budegt 2018

Dear Country Men,

The fourth and last budget of the Modi Government is out today. With many good thing containing  the budget I am raising few questions worth paying attention:


1. Tax slab is not changed. May public ask why? Income tax has provision to do the indexing of the value based on which income tax is charged eg. you buy a plot in year 2000 for 10 lakhs and if sale it in 2017 then tax slab is calculated as per index to take care of inflation. In the similar manner  why tax slab is not changed every two years based on the inflation. Why public after voting once be ransom to the politician wish and wisdom. It should be taken care automatically ever two years.


2.Modi ji after taking over as PM begin talk to create Rail University. In 2016 Budget it was included in the Railway Budget presented by MR Suresh Prabhu. Now the Govt. should inform the progress made in it. Modi ji also said after four years I will give performance report. Today again it has been announced to put Railway University . Let the public know the status.

This is also important because lot of man power is required for implementing Rs.1,46,000 Lakh projects. How with out manpower these project will be executed with out skilled man power.

3. Today Government announced to merge Govt. owned General Insurance companies and make mega company. This is understood this is being done to make the large organization to de-invest and create wealth for the Government.

Similar plan was given in 2017 budget to merge public sector banks and create 5 banks only. May we ask what happen to that plan. Under this scheme Corporation bank was to be merged in Punjab National Bank. The only work done so far is the use of new banking software is bought by Corporation bank. Now if you ask for any information which is 6-8 months old the simple reply will be given software is changed and new software is yet not compatible with old one so information will take 15-40 days? So many governance issues are left to be handled by the public? With out proposer training of manpower and backend preparation this all is creating chaos for public. I am afraid this new merger will also end up similar . Various schemes merger will take time. Lot of governance issues will also crop up. It is therefore advised to implement it after full preparation.
Ajay Singh