Wednesday, December 19, 2018

किसानो की कर्ज माफ़ी:चींटी से बचने के लिए चीते को निमंत्रण

 दोस्तों ,
पिछले हफ्ते पाँच राज्यों में चुनाव सम्पन्न हो गये। इसमें तीन हिन्दी भाषी राज्यों मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीस गढ़ में कांग्रेस की विजय हुई है। इस विजय के पीछे  मध्यप्रदेश और छत्तीस गढ़ में जीत का एक कारण तो है पिछले पंद्रह सालों से राज्य कर रही बीजेपी को बदल कर दूसरी पार्टी का शासन  लाने  की चाहत यानी शासन में  बदलाव। बदलाव की चाहत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है हालांकि यह आवशयक नहीं की बदलाव हमेशा अच्छे के लिए ही हो तो भी बिना बदलाव के तुलना संभव नहीं और तुलना करना हमारे मन का एक खास गुण है अतः जनता के द्वारा पंद्रह सालो का शासन बदले जाने को एक सामान्य प्रक्रिया   माना जा सकता है।  यही कारण राजस्थान में भी रहा। हालांकि राजस्थान में बीजेपी ने केवल पाँच वर्षो का एक ही सत्र पूरा किया फिर भी कांग्रेस का जीतना केवल बदलाव की चाहत का परिणाम है।  

लेकिन दूसरा बड़ा कारण  रहा कांग्रेस पार्टी के  चुनाव घोषणा पत्र में सरकार आने के दस दिन के भीतर किसानो का ऋण माफ़ करने की घोषणा। इसने सरकार बदले जाने की आकांछा को और प्रबल कर दिया। नतीजा तीनो राज्यों में   कांग्रेस की सरकार बन गयी। वादे के मुताबिक सरकारों ने कर्जमाफी की घोषणा करनी शुरू कर दी है। यह अलग बात है की इसको अमली जामा पहनाना आसान नहीं है। और इसका अर्थव्यवस्था पर कितना ख़राब  असर पड़ेगा इसका आकलन करने में भी काफी समय लगने वाला है।  कर्ज माफ़ी की घोषणा के पक्ष और विपक्ष में अर्थशास्त्रियों खास कर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन,अरविन्द पनगडीहा जैसे लोगो के बयान आये है और टीवी से लेकर अखबारों तक में इस पर बहस छिड़ी है। मजे की बात यह है की देश में यह न तो पहली बार हुआ है और न केवल कांग्रेस ने ऐसी घोषणा करके चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने भी ऐसा ही वादा किया था ,फिर कर्नाटक के चुनाव जो  इसी साल मई में सम्पन्न हुये में भी  किसानो की कर्ज माफ़ी का वादा किया गया  था। यद्यपि छै महीने बीत जाने के बाद भी इसको कार्यान्वित नहीं किया जा सका है। लेकिन बहस इसलिए ज्यादा गंभीरता से शुरू हुई है क्योकि लोक सभा चुनाव अगले छै महीनो  में होने  वाले है। और  लोक सभा चुनाव में सभी पार्टियाँ इस अजमाये  नुस्खे का इस्तेमाल  जीतने के लिए करना चाहेंगी।

यह एक गंभीर समस्या है और इसका  परिणाम देश की अर्थव्यस्था को  भुगतना  पड़ेगा। यहाँ एक और प्रश्न विचार योग्य है की क्या केवल किसानों की कर्ज माफ़ी ही एक ऐसा चुनावी  वादा है जो देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पंहुचा रहा है, जवाब है  नहीं, बल्कि जितने भी ऐसे चुनावी वादे किये जाते है जिसमें  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  रूप से सरकार द्वारा पैसा खर्च किया जाता है, ज्यादातर ऐसे होते है जो कि अर्थव्यवस्था के लिए अल्पावधि अथवा दीर्घावधि में नुकसान दायक ही होते है।ऐसा कभी सामाजिक समीकरण के नाम पर किया जाता है कभी किसी वर्ग विशेष की भलाई के नाम पर।   लेकिन ऐसे खर्च क्योकि तत्कालिक लाभ को ध्यान में रख कर किये जाते है अतः इसके बारे में ज्यादा विवेचना नहीं होती है और परिणामस्वरूप यह किसी न किसी रूप में नुकसानदेय साबित होते है। 

अजय सिंह "एकल"





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