Thursday, May 14, 2020

भारत का स्वदेशी अभियान

 दोस्तों ,

करोना वायरस से त्रस्त दुनिया के  सभी देश  अभूतपूर्व समस्याओं का वरण करने को मजबूर है। समस्या इतनी विकट है की इसका समाधान सामूहिक रूप  से भी निकाल  पाने में सक्षम नहीं दिख रहे है।दुनिया की बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियो से लैस देश भी उतने ही मजबूर और असहाय हो गए है जितने अपेक्षाकृत छोटे और कमजोर देश। बड़े बड़े वैज्ञानिक ,इंजीनियर और डॉक्टर्स अपने स्तर पर पूरी शांति के साथ मुकाबला कर रहे है लेकिन तीन चार महीने बीत जाने के बाद भी रौशनी की कोई किरण अभी भी नजर नहीं आ रही है। सभी देश अपनी परिस्थितयों और योग्यता अनुसार अकेले और सामूहिक रूप से स्थितियों  का मुकाबला  करने के लिए योजनाए बना रहे है।  भारत की गिनती दुनिया के बड़े और सक्षम देशो में की जाती है। मोदी जी के प्रधान मंत्री बनने के बाद ब्रांड इंडिया और मजबूत हुआ है। करोना जैसी विपत्ति से कुशलता पूर्वक निपटने के लिए दुनिया भर के बड़े देश और उनका नेतृत्व करने वाले लोग मोदी जी की तरफ आशा भरी नजरो से देख रहे है। इसलिए भारत की जिम्मेदारी और बढ़ गयी है। 

अब भारत के सामने दोहरी जिम्मेदारी है पहली अपने घर को ठीक रखना उनका उचित समाधान निकालना और दुनिया के दूसरे देशो को यथा सम्भव सहायता और मार्ग दर्शन करना। इस में कोई शक नहीं की पिछले पचास -साठ दिनों में करोना को फैलने से रोकना और संक्रमित हुए लोगो का उपचार करने में देश ने अद्भुत क्षमताओँ का प्रदर्शन किया है। देश के नेतृत्व को इसके लिए जितनी बधाई दी जाये कम है। पचास दिनों की देश बंदी से उत्पन्न हुई परिस्थितियों से निपटने का समय प्रारम्भ हो गया है। अलग अलग कार्यक्षेत्र की समस्याएं अलग अलग है और उनके समाधान भी। सरकार इनसे निपटने के लिए भगीरथ प्रयास कर रही है। और हम लोगो को  विश्वास  है की हम इसे विजयी होकर निकलेंगे। मोदी जी के नेतृत्व की अनेक विशेषताएं है। इसमें एक है छोटी छोटी समस्याओं से निपटने के लिए जनता का मन तैयार करना। क्योंकि सरकार के प्रयासों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित होने पर ही अपेक्षित परिणाम निकलते है। इसका एक उदाहरण है देश को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का अभियान  और दूसरा स्वछता अभियान। मोदी जी के आह्वान पर जनता के सभी वर्गों की सक्रिय  भागीदारी  अभियान की सफलता निश्चित करती है। 

करोना महामारी से उत्पन्न आर्थिक परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत सरकार की और से बीस  लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज का ऐलान कर दिया गया है जिससे मजदूर ,छोटे बड़े उद्यमी तथा समाज के अन्य वर्गों को आगे की राह बनाने में मदद मिलेगी। इस पैकेज  के  साथ ही मोदी जी ने जनता को स्वदेशी उत्पादों का अधिकाधिक उपयोग करने और इसका प्रचार कर सभी को प्रोत्साहित करने का आह्वान किया है। मेरा विश्वास है की यदि समाज के सभी स्टेक होल्डर अपनी जिम्मेदारिओं को ईमानदारी से निभाए तो देश आने वाले कुछ वर्षो में स्वदेशी अपना कर आत्मनिर्भर बन सकता है। 

इस आह्वान की सफलता के लिये देश में हुए   स्वदेशी आंदोलनों का इतिहास जानना जरुरी है। इसके सफलता पूर्वक कार्यान्वन में आने वाली दिक्कतों को जानकर उनका समाधान निकलने से ही इस अभियान में सफलता मिल सकेगी। दरअसल जनता से स्वदेशी अपनाने का आह्वान करने वाले मोदी जी पहले नेता नहीं है। देश में स्वदेशी आंदोलन के पांच चरण हुए है। पहला 1850 -1905  जिसका नेतृत्व दादा भाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले एवं एक नाथ राना डे इत्यादि ने किया।स्वदेशी आंदोलन का  दूसरा चरण 1905  -1917 में बंगाल विभाजन के विरोध में चला। इसका  नेतृत्व सुरेंद्र नाथ बनर्जी तथा के के मित्रा जी ने किया था। इस आंदोलन में मैंचेस्टर के बने कपड़ो और लिवरपूल के नमक का बहिष्कार किया गया। इस आंदोलन का प्रभाव केवल बंगाल में  था और यह जन  आंदोलन न बन सका।

स्वदेशी आंदोलन का तीसरा चरण शुरू हुआ गाँधी जी के नेतृत्व में 1917 में शुरू हुआ और 1947 में  आजादी मिलने  तक चलता रहा।  आंदोलन का तीसरा चरण जन  आंदोलन बना और बहुत ही प्रभावशाली रहा।इस आंदोलन में किसान,जमींदार ,नवाब  और आम  जनता सभी ने दिल खोल कर भाग लिया।  विदेशी सामान खास कर कपड़ो की होली देश भर में जलाई गयी। विदेशी वस्त्रो के बहिष्कार कर  घर -घर सूत कात  कर अपने हाथो से बने वस्त्र पहनने की परम्परा शुरू हो गई। इस आंदोलन के नेतृत्व कर्ता महात्मा गाँधी ने स्वयं  खादी पहनी और अपने जीवन में केवल स्वदेशी वस्तुएँ इस्तेमाल की।  इसलिए स्वदेशी आंदोलन ने आजादी दिलवाने में  बड़ा महत्वपूर्ण   योगदान किया। 

1947 में आजादी मिलने के बाद  इस  आंदोलन का चौथा चरण शुरू हुआ जो 1948  से 1991 तक चला।  इस आंदोलन की आड़ में देश में  लाइसेंस परमिट राज  की शुरुवात हो गयी और निहित स्वार्थी  व्यापारी और नेताओ  ने इसका खूब फायदा उठा कर आम आदमी को बड़े संकट में डाल दिया था।  हर तरह के सामान की उपलब्धता समस्या बन गयी और साबुन , चीनी, सीमेंट सब कालाबाजारी के साधन बन गए।स्कूटर जैसी चीजों को खरीदने के लिए पांच से दस साल तक का इंतजार करवाया जाता रहा। एक  टेलीफोन लगवाने के लिए 3  से 5 साल का समय लगता था।और यह सब कुछ काला  बाजार में बड़ी आसानी से उपलब्ध करवा दिया जाता था।    इस तरह देश की सीधी सादी जनता की भावनाओं का न केवल मजाक बनाया गया बल्कि इसकी आड़ में जनता का आर्थिक दोहन भी लम्बे समय तक किया गया।  

पी वी नरसिंघा राव जब  1992 में प्रधान मंत्री बने तब शुरू हुआ स्वदेशी आंदोलन का पाँचवा चरण।  इस दौरान दुनिया भर में तेजी से राजनैतिक परिवर्तन हुए जैसे यू एस एस आर का टूट कर 15 छोटे छोटे देशों में विभाजन हुआ ।  बर्लिन की दीवार का टूट कर पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का विलय  हो गया।   माना जाना चाहिए की आंदोलन का अभी पांचवा चरण चल रहा है। यदि सबकुछ ठीक रहा तो 2020 में इस आंदोलन का छठा चरण शुरू हो सकता है। 



स्वदेशी आंदोलन के पांच चरणों में  केवल तीसरा चरण ही जन  आंदोलन बना जिसका नेतृत्व खुद गाँधी जी कर रहे थे। इसकी सफलता के  मुख्य कारण निम्न है:


1 . भगवत गीता में श्री कृष्णा ने   कर्म योग समझाते हुए  कहा है :

  यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।। 

इसका अर्थ है की  "श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।" (Whatever action is performed by a great man, common men follow in his footsteps. And whatever standards he sets by exemplary acts, all the world pursues.)


इस कथन को गाँधी जी ने अक्षरश: पालन किया उनका  हर दिन खादी के लिए सूत कातने  से प्रारम्भ होता था। और  वह जीवन पर्यन्त  खादी पहनते रहे। 



2. गाँधी जी ने विदेशी वस्त्रो की होली जलवाई और  उसका उचित समाधान भी दिया। आम आदमी को उसका  पालन करने में बड़ी स्पष्टता थी की वह क्यों कर रहा है तथा इसका अपेक्षित  परिणाम क्या है।

3. देश उस समय अंग्रेजो के अधीन था तथा उनके खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन  को गाँधी जी के साथ अन्य बड़े स्वतंत्रता सेनानी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे यह सभी एक स्वर में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही स्वदेशी आंदोलन का  भी समर्थन  कर रहे थे तथा  अपने आचरण से जनता के सामने भी वैसा ही आदर्श रख  रहे थे। अर्थात कथनी और करनी दोनों एक समान थी और इसमें किसी संदेह की कोई गुंजाईश ही नहीं थी।  

आज करोना महामारी के कारण उतना  ही बड़ा संकट देश के सामने फिर उठ खड़ा हुआ है। सौभाग्य से देश को  मोदी जी जैसे वैश्विक नेता का नेतृत्व भी प्राप्त हो रहा है इसलिए संकट से हम शीघ्र ही बाहर आएंगे इस विश्वास के साथ देश की 130 करोड़ जनता मोदी जी के साथ खड़ी भी है लेकिन इसमें एक चीज जो मिसिंग है वह है उच्च नेतृत्व का इस बात को न समझपाना की जनता अपने नेता का अनुसरण करती है और मोदी जी स्वयं विदेशी ब्राण्ड के उन सामानो का इस्तेमाल खुल कर करते है जिनके बिना भी काम चल सकता है।  ऐसे में जब मोदी जी जनता का स्वदेशी के लिए आह्वान करते है तो यह आवश्यक है की वह खुद इनको छोड़ने की घोषणा करे। साथ ही अपनी टीम के दूसरे लोगो को भी यह अनुशासन पालन करने का आदेश दे ताकि जनता में सही सन्देश जाये और लोगो को यह विश्वास हो की हमारा नेतृत्व अगर कोई बात कह रहा है तो स्वयं भी इसका पालन करता है।  

स्वदेशी आंदोलन के छठे चरण को सफलता पूर्वक अपने  लक्ष् की  प्राप्ति के लिए केवल जन आंदोलन पर्याप्त नहीं है इसमें निति निर्धारण और उसके अनुशीलन के लिए सतत ईमानदार प्रयास सभी साझेदारों  (स्टेक होल्डर्स ) द्वारा किया जाना आवश्यक है। इक्कीसवी शताब्दी में चलने वाले आंदोलन को एक तरफ़ा यानि नेतृत्व ने जो भी कह दिया उसे सभी बिना तर्क और प्रमाण के स्वीकार करे यह लगभग असंभव है। अब दुनिया पहले से ज्यादा समझदार है। संवाद के साधन सबको न केवल आसानी से उपलब्ध है बल्कि पलक झपकते ही दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंच जाती है। स्वदेशी और विदेशी सामान भी स्थानीय  बाजार में  आसानी से उपलब्ध इसलिए उसके गुण  और दोष परखना आसान है मूल्यों की तुलना भी तुरंत हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कानून  भी ऐसे है कि विदेशी सामानों के बाजार में  आने पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगा सकते है।  इसलिए आवश्यक है की इसके लिए  आज के समय की आवश्यकता के अनुसार रणनीत तय हो और समयबद्ध तरीके से लक्ष्य को हासिल करे। 

अपने अगले लेख में इस विषय में और    विस्तार पूर्वक चर्चा करूँगा। 

अजय सिंह "एकल " 



Thursday, February 21, 2019

न भूलेंगे न माफ़ करेंगे अब तुमको बस साफ़ करेंगे

दोस्तों ,
पूरी दुनिया में जिस समय प्यार मुहबत्तों की बाते हो रही थी ,नवयुवक भविष्य की कल्पनाओं में खोये थे ,बूढ़े भूत की घटनाओं को याद कर रहे थे उसी समय पाकिस्तानी आतंकी ग्रुप जइसेमुहम्मद के द्वारा प्रेरित आदिल अहमद दर नामक एक कश्मीरी आतंकी युवक ने एको कार में ३०० किलो  विस्फोटक ले जाकर सेंट्रल रिज़र्व प्रोटेक्शन फ़ोर्स की ७८ बसों में से एक जिसमे करीब ४५ लोग सवार थे , में टक्कर मारकर विस्फोट करदिया जिससे  ४० जवानों शहीद हो गए एवं अन्य कई घायल अवस्था में अपना  उपचार करवा रहे है।  पिछले अनेक वर्षो में हुए आतंकी हमलो में यह २६ ग्यारह के हमले के बाद सबसे भीषण एवं नृशंस हमला है। नरेंद्र मोदी की सरकार के अंतिम महीनो हुआ यह हमला कई मानों में अहम है। पिछले सालो मे देश में हिदुत्व वादी वातावरण बना है। नरेंद्र मोदी को आजादी के बाद सबसे बड़ा हिंदुत्ववादी प्रधानमंत्री बना कर पेश किया गया है

सेना को आदेश थमा दो अब  घाटी गैर नहीं होगी
जहाँ तिरंगा नहीं मिलेगा उसकी खैर नहीं होगी

Thursday, January 17, 2019

समाज के लिए समर्पित एक आदर्श जीवन :रज्जु भईया

दोस्तों ,

इलाहबाद विश्वविद्यालय का  एक मेधावी छात्र  क्रन्तिकारी विचारों से प्रभावित हो कर १९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध  को सहयोग करने के लिए कांग्रेस के द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के दिशा हीन  हो जाने से निराश विकल्प की तलाश कर रहा था । इस बीच  अपने एक मित्र शांता राम कलासकर के अनुरोध पर  संघ के  कार्यक्रम में सम्मलित हो  कर  उसके अनुशासन और कार्य पद्धति देखकर मन को दिलासा हुई और विश्वास जगा की यह संगठन आजादी की लड़ाई को सही दिशा में ले सकता है।विभाग प्रचारक  बापू राव मोघे   से बातचीत करने के बाद  संघ कार्य में विश्वास और पक्का हुआ। एक शाखा में गटनायक का पद लेकर  शुरू हुई  जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भईया की संघ यात्रा। यह यात्रा साधारण नहीं थी। भौतिक शास्त्र के  प्रतिभा शील विद्यार्थी  होने के कारण अनेक नामी गिरामी वैज्ञानिको के निमंत्रण को अस्वीकार करना ,माता पिता जी के विवाह कर के गृहस्थ जीवन बिताने  के आग्रह को  त्याग,  समाजिक जीवन जीने का चुनाव सब कुछ आसान नहीं था। परन्तु कठिन परिश्रम करते हुए  कुशल संगठन कर्ता  बन कर   एक- एक सीढ़ी चढ़ते हुए सरसंघ चालक के पद को सुशोभित करने का सौभाग्य प्राप्त किया। इतना ही नहीं, लगभग ५८ वर्षो के सक्रिय सामाजिक जीवन में समाज में नए आदर्शो को स्थापित करने का श्रेय भी रज्जु भईया को प्राप्त है।

संघ कार्य के ७० वर्ष पूरे होने पर अपने एक भाषण में रज्जु भईया ने कहा था की अब देश में हिंदुत्व की विचार धारा के अनुकूल माहौल बनता दिख रहा है वायु मंडल के इस बदलाव के कारण हिन्दू हितों की चिंता करने वाली सरकार के लक्छण दिख रहे है। हिंदुत्व की इस बढ़ती लहर को देखते हुए राष्ट्र विरोधी शक्तियाँ घबड़ाई हुई है। लगभग २५ वर्षो के बाद मोदी सरकार के खिलाफ एक जुट विरोधियों की गतिविधियाँ उनकी कही हुई बात को सही सिद्ध कर  रही है।

समाज में व्याप्त समस्याओं एवं विषमताओं के बारे में उनका बड़ा स्पष्ट मत था की सरकार या सरकारी कर्मचारी समाज-पर्रिवर्तन नहीं ला सकते।  सरकार हमारे मार्ग में रोड़ा न बने और अनुकूल वातावरण बनाने में सहयोग करे हम इतनी ही अपेक्षा करते है। समाज परिवर्तन तो वयक्ति बदलने से होगा। डाक्टर जी ने व्यक्ति को संस्कार देने की संघ शाखा की अभिनव पद्धति निर्मित की।  शाखा के कार्यक्रमों में हिन्दू समाज में समरसता , अनुशासन और चरित्र निर्माण होता है। संघ द्वारा चलाये जा रहे विद्यालयों में भी अच्छी पढाई के साथ अच्छे संस्कार प्राप्त होते है। यह बंधु समाज सेवा की भावना से ओत प्रोत होते है इसीलिए संघ की कार्य पद्धति पर सम्पूर्ण समाज का विश्वास बढ़ा है की इसमें से राष्ट्र सेवा के लिए संस्कारित व्यक्ति निर्मित किये जा सकते है। हमारी     शाखाये बढे ,उनमे अधिक से अधिक संख्या हो और उसके कार्यक्रम अधिक संस्कारक्षम हो , यही आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।

हमारे समाज में अपूर्व सामर्थ्य है। उसे जगाने का कार्य करना होगा। समाज में ऐसी मनोवृति पैदा करनी होगी की समाज के सारे  काम हमारे  ही प्रयासों से संपन्न हो।  आज समाज के सामर्थ्य को भुला दिया गया है।  सबकुछ सरकार  के भरोसे छोड़ दिया गया है जिसकी वजह से देश की दुर्दशा हुई है। इसलिए सोये हुए समाज की क्षमता को जगाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ताकि समाज अपनी जरूरतों के मुताबिक आवश्यक विद्यालयों का संचालन ,पीने का  पानी , पर्यावरण  ,सफाई इत्यादि की व्यस्था खुद करे और सरकार पर निर्भरता कम से कम हो।

अपने समाज में तीन ऋण माने  गए है पितृ ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।  परिवार में माता पिता और अन्य वृद्ध लोगो के साथ सम्मान पूर्वक रह कर पितृ ऋण ,प्रकृती ,पर्यावरण,गऊ इत्यादि   के बारे में जागरूकता और इसका आवश्यकता से अधिक दोहन न करने की आदत हमें देव ऋण से तथा सबकुछ समाज का है और समाज से ही लिया है तो समाज को वापस किया जाना चाहिए इस भाव से यदि जीवन जिया जाये तो हमें तीनो ऋणों से मुक्ति मिलती है।  इस भाव को जगाना और इसी के अनुसार अपना जीवन जीना यही आदर्श जीवन शैली है।

आज संघ देश की सम्पूर्ण स्थिति बदलने के लिए लोगो को लगाने के लिए संकल्पित है और मातृभूमि के प्रति प्रेम की भावना जगाने का कार्य संघ निरंतर करता आ रहा है। हम ऐसा भारत बनाने के लिए कार्य रत है की भारत माता की जय हम ही नहीं पूरी दुनिया के लोग कहे। यही हमारी प्रतिज्ञा है। और जब तक यह प्राप्त न होगा हम तबतक शांत  नहीं बैठ सकते।

रज्जू भईया का पूरा जीवन हम सभी स्वयंसेवकों के लिए आदर्श एवं प्रेरणादायी है। उनके द्वारा दिखाये गए  मार्ग पर चल कर ही  हम भारत को इसका पुराना गौरव वापस दिलवा सकते है। सन २०२२ यानि अब से तीन वर्षो के बाद रज्जू भईया की जन्म शताब्दी मनाने का अवसर हिंदू समाज को मिलने वाला है। इसकी तैयारी हम अभी शुरू कर रहे है। ताकि उनके विचारो को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पंहुचा सके।  और उनके दिए मार्गदर्शन को समाज के सामने ला सके।


अजय सिंह 
महा सचिव 
प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भईया ) स्मृति संस्थान 




Monday, December 24, 2018

किसानो की कर्ज माफ़ी : विकल्प क्या है ?

दोस्तों,

किसानो की कर्ज माफ़ी का वादा करके कांग्रेस ने हाल  में हुऐ तीन राज्यों में चुनाव जीत लिया है। सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री कर्ज माफ़ी के  वादे को  पूरा करने की कोशिश  करते हुए भी दिख रहे है। किन्तु उन्हें पता है राज्यों के लिए यह आसान नहीं है। देश में अर्थशास्त्रीयों जिसमे पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह से लगा कर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और योजना आयोग के अरविन्द पनघड़िआ तक शामिल है।  लेकिन चिंता यही ख़तम नहीं हो गयी है। असल में तो चिंता अब शुरू हुई है। अगले छै महीने में आम चुनाव होने वाले है। यह चुनाव दोनों प्रमुख दलों यानि कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। पार्टियों के नीत कार किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने की तैयारी करंगे। फिर इसमें होड़ लगेगी कर्ज माफ़ी की ,बेकारी भत्ता देने की  और देश हित को किनारे रख कर अन्य प्रलोभन देने की। इसका नकारात्मक प्रभाव देश की अर्थव्यस्था पर पड़ेगा  यह जानते हुए भी चुनाव किसी भी कीमत पर जीतना है इसलिए दूसरे दल के मुकाबले ज्यादा से ज्यादा देने की घोषणा की होड़ लगने वाली है। सवाल यह है की किसान के हालत को बेहतर करने का विकल्प क्या है।

हम सब जानते है कि देश में आधी आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर है। पिछले सत्तर सालो में हमारे नीत नियंताओं की वजह से  कृषि की हालात ऐसे हो गए है की खाना हर कोई चाहता है लेकिन उगाना कोई नहीं चाहता। दूसरे व्यसायों की तरह जैसे डाक्टर अपने बच्चो को डाक्टर और वकील अपने बेटे को वकील बनाना
चाहता है किन्तु  किसान अपने बच्चो को किसानी करने के लिए उत्साहित नहीं करता। कारण ज्यादा मेहनत ,कम मुनाफा ,प्रकृति के ऊपर निर्भरता तो स्वाभाविक है लेकिन खाद और पानी के व्यापारिओं  और बिचौलियो ने कुल मिलाकर इसे न करने योग्य व्यसाय बना दिया है। इसलिए किसान का बेटे के लिए किसानी जीविका का आखरी उपाय है। यहाँ तक की किसान अपनी जमीन गिरवीं रख कर या बेच कर भी अपने बेटे को शहर में नौकरी करने के लिए भेजने में ही गर्व भी महसूस करता है और मानता है की सुरक्षित भविष्य का यही तरीका है।     

देश में कृषि की इस दशा के लिए जिम्मेदार कोई भी हो इसको ठीक करने की ,किसानो को सम्मान जनक आर्थिकस्तिथी के लिए अनुकूल वातावरण बनाना हमारी जिम्मेदारी है। कर्ज माफ़ी ,एमसपी जैसे उपाय सामायिक राहत तो दे सकते है किन्तु स्थाई समाधान के लिए हमें थोड़ा गहराई में जा कर योजना का क्रियान्वन करना होगा। योजना बनाने में जो लोग क्रियान्वन करने वाले है उनका सक्रिय सहयोग लेना आवश्यक है,दल  हित के बजाय देश हित में क्या ठीक है यह सोच रखनी पड़ेगी। इसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है की कोई एक नुस्खा पुरे देश में लागू नहीं हो सकता है इसे स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से संशोधित करना पड़ेगा। योजना में आवश्यक सुधार समय की अनुभव और मांग के अनुसार किया जा सके इसका भी प्रावधान हमें करना होगा। यानी नीतिओंमें इतना लचीलापन चाहिए ताकि अनावश्यक प्रशासनिक बाधाएं काम को रोक न सके।

इतना सब कुछ करके हम किस लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते है ? मेरे विचार में कृषि क्षेत्र को निम्न लक्ष्य रखना ठीक रहेगा :

१.  देश की आवश्यकता के लिए पर्याप्त उपज प्राप्त करना। 
२.  निर्यात योग्य  गुड़वत्ता   के  कृषि उत्पादों का उत्पादन एवं निर्यात। 
३. कृषि को व्यसायिक तरीके से करना तथा किसानो को उनकी भागीदारी के अनुपात में मुनाफे में हिस्सेदारी सुनिश्चित करना। 
४.गांव के नवयुवकों के लिए रूचि एवं क्षमता के अनुसार स्थानीय व्यसाय के अवसर उपलब्ध करवाना। 
५.गावँ में पर्याप्त भौतिक साधनों की उपलब्धता पलायन रोकने में सहायक होगी। 

इन लक्ष्यों की प्राप्ति तथा गावं की सर्वांगीण विकास के लिए समाज के सभी वर्गों का सहयोग अपेक्षित है। आखिर स्वास्थ्य वर्धक भोजन सभी की मूल आवश्यकता है तो हम इसे कुछ लोगो की इच्छा पर कैसे छोड़ सकते है।  समयबद्ध तरीके से प्रयास करके इस लक्ष्यों को प्राप्त करना सम्भव है आवश्यकता है तो खुले दिमाग से विचार करने की ,व्यक्तिगत स्वार्थो से ऊपर उठ कर ईमानदार कोशिश करने की। आगे हम विभिन्न मॉडलों पर विचार करेंगे।

अजय सिंह "एकल"
  



Wednesday, December 19, 2018

किसानो की कर्ज माफ़ी:चींटी से बचने के लिए चीते को निमंत्रण

 दोस्तों ,
पिछले हफ्ते पाँच राज्यों में चुनाव सम्पन्न हो गये। इसमें तीन हिन्दी भाषी राज्यों मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीस गढ़ में कांग्रेस की विजय हुई है। इस विजय के पीछे  मध्यप्रदेश और छत्तीस गढ़ में जीत का एक कारण तो है पिछले पंद्रह सालों से राज्य कर रही बीजेपी को बदल कर दूसरी पार्टी का शासन  लाने  की चाहत यानी शासन में  बदलाव। बदलाव की चाहत एक स्वाभाविक प्रक्रिया है हालांकि यह आवशयक नहीं की बदलाव हमेशा अच्छे के लिए ही हो तो भी बिना बदलाव के तुलना संभव नहीं और तुलना करना हमारे मन का एक खास गुण है अतः जनता के द्वारा पंद्रह सालो का शासन बदले जाने को एक सामान्य प्रक्रिया   माना जा सकता है।  यही कारण राजस्थान में भी रहा। हालांकि राजस्थान में बीजेपी ने केवल पाँच वर्षो का एक ही सत्र पूरा किया फिर भी कांग्रेस का जीतना केवल बदलाव की चाहत का परिणाम है।  

लेकिन दूसरा बड़ा कारण  रहा कांग्रेस पार्टी के  चुनाव घोषणा पत्र में सरकार आने के दस दिन के भीतर किसानो का ऋण माफ़ करने की घोषणा। इसने सरकार बदले जाने की आकांछा को और प्रबल कर दिया। नतीजा तीनो राज्यों में   कांग्रेस की सरकार बन गयी। वादे के मुताबिक सरकारों ने कर्जमाफी की घोषणा करनी शुरू कर दी है। यह अलग बात है की इसको अमली जामा पहनाना आसान नहीं है। और इसका अर्थव्यवस्था पर कितना ख़राब  असर पड़ेगा इसका आकलन करने में भी काफी समय लगने वाला है।  कर्ज माफ़ी की घोषणा के पक्ष और विपक्ष में अर्थशास्त्रियों खास कर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन,अरविन्द पनगडीहा जैसे लोगो के बयान आये है और टीवी से लेकर अखबारों तक में इस पर बहस छिड़ी है। मजे की बात यह है की देश में यह न तो पहली बार हुआ है और न केवल कांग्रेस ने ऐसी घोषणा करके चुनाव जीता है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने भी ऐसा ही वादा किया था ,फिर कर्नाटक के चुनाव जो  इसी साल मई में सम्पन्न हुये में भी  किसानो की कर्ज माफ़ी का वादा किया गया  था। यद्यपि छै महीने बीत जाने के बाद भी इसको कार्यान्वित नहीं किया जा सका है। लेकिन बहस इसलिए ज्यादा गंभीरता से शुरू हुई है क्योकि लोक सभा चुनाव अगले छै महीनो  में होने  वाले है। और  लोक सभा चुनाव में सभी पार्टियाँ इस अजमाये  नुस्खे का इस्तेमाल  जीतने के लिए करना चाहेंगी।

यह एक गंभीर समस्या है और इसका  परिणाम देश की अर्थव्यस्था को  भुगतना  पड़ेगा। यहाँ एक और प्रश्न विचार योग्य है की क्या केवल किसानों की कर्ज माफ़ी ही एक ऐसा चुनावी  वादा है जो देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पंहुचा रहा है, जवाब है  नहीं, बल्कि जितने भी ऐसे चुनावी वादे किये जाते है जिसमें  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  रूप से सरकार द्वारा पैसा खर्च किया जाता है, ज्यादातर ऐसे होते है जो कि अर्थव्यवस्था के लिए अल्पावधि अथवा दीर्घावधि में नुकसान दायक ही होते है।ऐसा कभी सामाजिक समीकरण के नाम पर किया जाता है कभी किसी वर्ग विशेष की भलाई के नाम पर।   लेकिन ऐसे खर्च क्योकि तत्कालिक लाभ को ध्यान में रख कर किये जाते है अतः इसके बारे में ज्यादा विवेचना नहीं होती है और परिणामस्वरूप यह किसी न किसी रूप में नुकसानदेय साबित होते है। 

अजय सिंह "एकल"





Monday, November 26, 2018

चुनाव आयोग के नाम खुला पत्र



श्री ओ पी रावत

मुख्य चुनाव आयुक्त

भारत।


महोदय ,


देश में चुनाव का माहौल पूरे जोर पर है। पांच विधान सभाओं के चुनावों के तुरंत बाद लोक सभा के चुनाव होने की प्रक्रिया शुरू हो जायगी। देश में निष्पक्ष चुनाव हो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। चुनाव आयोग का एक दाग रहित इतिहास है जिसने दुनिया में भारत को लोकतान्त्रिक देशो की कतार  में अग्रिम पंक्ति में जगह दिलाई है। आने वाले समय में भी आपकी भूमिका बहुत  महत्वपूर्ण रहने वाली है। हम भारत के १३५ करोड़ लोगो की इच्छा और आकांछा पर आपका खरा उतरना निश्चित है। पिछले कुछ दिनों में जिस तरह के निर्णय चुनाव आयोग ने किये है उससे इस संस्थान  के प्रति आम आदमी का विश्वास  और बढ़ा  है।  आयोग के द्वारा लिया गया निर्णय " चुनाव उम्मीदवारों को अपना  अपराधी वृत्त तीन बार  अख़बार और दूरदर्शन में प्रसारित करना आवश्यक होगा" निश्चित ही एक मील का पत्थर साबित होगा। 


निष्पक्ष चुनावो के लिए एक और अत्यंत महत्व पूर्ण बिंदु है कि जो वायदे चुनाव में किये जाये उन्हें यथा सम्भव   जीतने वाले दलों द्वारा पूरा किया जाये। कुछ ऐसे वादे जो पूरे नहीं हो पाये उनका अगले चुनाव घोषणा पत्र  में जिक्र हो और उसके पूरा न हो पाने के कारण विस्तार से बता देना आवश्यक किया जाना चाहिए। ताकि आम आदमी को यह पता लग जाये की जो वायदे किये गए थे उन्हें कार्यान्वित करने की कोशिश की गयी या नहीं और वह अगले चुनावों के बाद कार्यान्वित किये जायँगे अथवा नहीं। 


हर चुनाव में कुछ ऐसे वादे किये जाते है जिनका सीधा सम्बन्ध अर्थ से अर्थात रूपये खर्च करने से होता है।इस तरह के वायदों को पूरा करने के लिए आवश्यक है की इनका प्राविधान बजट में हो।  उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश बीजेपी ने कहा है की बारहवीं पास करने वाली छात्राओं को स्कूटी दी जाएगी अथवा  किसानो को दीर्घ कालिक ऋण ब्याज मुक्त होंगे इत्यादि।  इसी तरह कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र  कहा है की किसानो का कर्ज सरकार बनने के  दस दिनों के अंदर माफ़ होगा और नवयुवकों को रोजगार देने वाले उद्यमों को वेतन अनुदान दिया जायेगा। केवल स्कूटी दिए जाने के वायदे के लिए कम से कम पांच सो करोड़ रुपये  (१00000  X ५0000  =५00,00,00,000 ) किसानो का कर्ज माफ़ करने के लिए प्रति किसान 2,00,000 रुपये के हिसाब से एक लाख किसानो का कर्ज माफ़ करने के लिए दो हजार करोड़ की आवश्यकता होगी। क्या मध्य प्रदेश की सरकार वास्तव में इस खर्च को उठा पायेगी और इसके लिए किन लोगो पर और कितना टैक्स लगाया जायेगा?  


ऐसे लोकलुभावन वायदे जनता को वोट देने  के लिए राजनैतिक दलों  द्वारा हर चुनाव में किये जाने की एक लम्बी परम्परा देश में बरसो से चली आ रही है। इन वायदों से  जिनको दिया जाने का वायदा किया जा रहा है उसका तो जिक्र है लेकिन इन खर्चो को पूरा करने के लिए जो धन जुटाया जायेगा उसे किस तरह के कर लगा कर किन लोगो से वसूला जाएगा इसका कोई भी उल्लेख नहीं होता। अतः जिन्हे मिलना है उन्हें तो पता है की अमुक पार्टी जीतने  पर यह देने वाली है किन्तु जिनसे वसूला जायेगा उन्हें नहीं पता की इसकी कितनी कीमत उन्हें चुकानी है और उसका विरोध करना चाहिए अथवा समर्थन । इस तरह एक पक्षीय बाते करके चुनाव जितने की परम्परा खतम की जानी चाहिए।  इसे  नियम को भी निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाये। 

अच्छा हो  कि  चुनाव आयोग घोषणा पत्र का एक प्रारूप सभी दलों के साथ बैठ कर तय करे जिसमे  निम्न बिंदु दिया जाना आवश्यक हो :

१. पिछले घोषणा पत्र का पुनरावलोकन।  क्या वादे किये गए क्या पूरे हुए। जो नहीं पूरे  हुए उनका कारण।  अगले चुनाव के बाद उनके पूरा किये जाने की सम्भावना। 

२. समाज को समृद्ध करने वाली  योजनाएं : इसमें महिलाओं ,किसानो, नवयुवकों इत्यादि के लिए चलायी जाने वाली योजनाओं  की जरुरत क्यों है ,योजनाये कैसे चलेगी,उनसे सम्बंधित लोगो को क्या लाभ मिलने की संभावनाएं , अनुमानित लागत  और उस व्यय को करने के लिए की जाने वाली व्यवस्था।   

३. समाज के समृद्ध लोगों के लिए योजनाए :जो लोग आर्थिक सम्पन्न  है उनके लिए सरकार क्या योजनाए लाने  वाली है और उन्हें क्या और  किस तरह से लाभ होगा।

४. अन्य साधारण योजनाए  : सरकार आने पर अन्य क्या योजनांए लागू की जाएँगी जिससे समाज के सभी लोगो को लाभ मिले और जीवन स्तर बेहतर हो सके। 


उपरोक्त दिए हुए बिंदु केवल ध्यानाकषर्ण के लिए है इन्हे और विस्तार से बनाना सम्भव है। ताकि राजनैतिक दलों  द्वारा की जाने वाली घोषणाएं केवल आकर्षक ही नहो बल्कि  ज्यादा सार्थक भी हो सके। और चुनाव घोषणा पत्र केवल लोक लुभावन वादों का एक पुलिंदा और  महज एक शिष्टाचार बनकर न रह जाये। इस तरह का नियम चुनावी  रैलीयों  में  मनमाने तरीके से की जाने वाली घोषणाओं पर भी रोक लगाएगी । इस तरह चुनाव हो जाने के बाद किसी को यह कहने का भी अवसर नहीं  मिलेगा  की यह तो चुनावी जुमला था और न यह की हमने तो चुनाव जीतने के लिए घोषणा कर दी थी लेकिन यह विश्वास नहीं  था की जनता इन पर यकीन  करके चुनाव जिता  देगी। 



अजय सिंह "एकल"



                                                                           
      अन्त में 

                 जो परेशानियाँ कामयाबी का हिस्सा बन जाती है 
                            बाद  में वही मुश्किलें कामयाबी का किस्सा बन जाती है 




  

Friday, May 25, 2018

मोदी के चार साल ,क्या है जनता का हाल

दोस्तों ,

देखते ही देखते मोदी सरकार के चार साल निकल गए और नये चुनावोँ  की दस्तक सुनाई देने लग गई है । पुराने खिलाडी नयी योजनाओं के साथ खेलने को तैयार हो रहे है। पिछली बार मोदी जी गुजरात से केंद्र में आये थे तो उनके व्यक्तित्व  के बारे में,सोचने और काम करने के तरीकों का  ज्यादा कुछ पता नहीं था। केवल एक बात जो जनता जानती थी वह था गुजरात में हुये दंगे और उनसे मोदी जी कैसे निपटे।  फिर समय समय हुए पर कुछ कोर्ट केस और उनके निर्णयों के बारे में राष्ट्रीय अख़बार और टीवी चैनलों के माध्यम से मिली सीमित जानकारी के आधार पर मोदी जी के बारे में जन भावना का निर्माण हुआ । क्योकि राष्ट्रीय स्तर पर खास जानकारी नहीं थी तो इसका  स्वाभाविक लाभ मोदी जी को मिला और अभूतपूर्व विजय श्री मोदी जी के नेतृत्व में  भाजपा को  प्राप्त हुई और पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बन गयी।   चारो और देश में ऐसा माहौल बना  मानो जनता की वर्षो पुरानी  मुराद पूरी हुई।  कुछ को लगा की बस अब तो रामराज्य आने वाला है इसलिए चाहे राम मंदिर निर्माण हो या पाकिस्तान से दो दो हाथ कर हिसाब चुकता करना हो सब सम्भव हो जायेगा। मोदी जी ने चुनाव में वह सारे वादे कर दिए जिनका जरा भी असर वोट पर पड़ने वाला था या पड़ सकता था। मसलन रोजगार ,बैंक एकाउंट में पैसे,सबका  साथ सबका  विकास इत्यादि इत्यादि। हालांकि मोदी जी को पता था की इतने वादे पूरे करना संभव नहीं फिर भी करो या मरो की  तर्ज इलेक्शन जितना ही एक मात्र उद्देश्य है इसलिए वादे करते चले गए।  और नतीजा अच्छा रहा।

मोदी जी के लाल किले पर दिए गए पहले भाषण से ही ऐसा लगा की देश की जनता की सभी मांगे धीरे -धीरे पूरी होनी शुरू हो जाएँगी। स्वछता अभियान, पाकिस्तान से दोस्ती ,अमरीका से लगा कर यु के  तथा अन्य महाशक्तियों के लोगो से मोदी जी दोस्ती गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा का दिल्ली आना सब कुछ बहुत जोरदार रहा। लेकिन उसी समय से विरोधिओं ने भी अपने ढंग से कमान सम्भाली और शुरू हुआ पुरुस्कार लौटने का सिलसिला। पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से खूब शोर मचा।  तमाम योजनाओ का शुभारम्भ किया गया। कांग्रेस सरकार राज्यों में हुए चुनावों में ेके के बाद एक हारती चली गयी। तो कभी इ वी एम् मशीन को दोष दिया गया कभी हिन्दू मुस्लिम कार्ड  खेला गया।    कुल मिला कर आशा निराशा से भरा पहला साल ख़तम हुआ।

दूसरे साल में भी पुरानी घटनाओं  के साथ मामला भारत विरोधी गतिविधियो की और बढ़ा इसमें जे एन यू की घटनाये    सबसे ज्यादा चर्चा में रही।  लेकिन यू पी और बिहार चुनाव के पहले नोट बंदी ने लोगो को हिला के रख दिया। आम आदमी जिसने दुःख सुख को एक जैसा मान कर जीने की आदत डाल ली थी और मान लिया था की सरकारे अमीरो के हित  में काम करती है एक नयी राह  दिख गयी और ऐसा लगा की मोदी सरकार अमीरो के खिलाफ भी कुछ कर सकती है। इसके पहले इंदिरा गाँधी ने जब बैंको का सरकारी करण किया था तो भी कुछ ऐसा महसूस हुआ था लेकिन उस घटना से प्रभावित होने वाले लोग काम थे। नोट बन्दी  ने तो गरीबो और अमीरों दोनों को हिला दिया लेकिन देश ने इसे काले धन के   खिलाफ एक बड़ी जंग मान कर सरका का भरपूर समर्थन किया।

एक देश एक टैक्स का नारा देकर मोदी सरकार ने पुरे देश में एक टैक्ससिस्टम लागू किया जी एस टी के माध्यम से।  और इसने एक बार फिर देश में व्यापार करने के ढंग को बदला और काले धन तथा टैक्स की चोरी को प्रभावित किया। धीरे धीरे देश की गाड़ी नयी पटरी पर चलने को तैयार हो गई। पुरानी सोच बदली और यह देश हमारा है हमें भी इसके लिए कुछ करना चाहिए का भाव जनता में आना शुरू हो गया। हालांकि इसमें सबकुछ ठीक हो गया कहना मुश्किल है लेकिन फिर भी चीजे बदली है और यह बदलाव देश से लगा कर विदेशो तक और विदेश में रह रहे भारतीयों ने भी महसूस किया। ब्रांड भारत दिखने लगा ,आर्थिक मोर्चे पर अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी जैसे स्टैण्डर्ड एंड पुअर इत्यादि ने अ
च्छी रैंकिग दी।














और अंत में