दोस्तों ,
इलाहबाद विश्वविद्यालय का एक मेधावी छात्र क्रन्तिकारी विचारों से प्रभावित हो कर १९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध को सहयोग करने के लिए कांग्रेस के द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के दिशा हीन हो जाने से निराश विकल्प की तलाश कर रहा था । इस बीच अपने एक मित्र शांता राम कलासकर के अनुरोध पर संघ के कार्यक्रम में सम्मलित हो कर उसके अनुशासन और कार्य पद्धति देखकर मन को दिलासा हुई और विश्वास जगा की यह संगठन आजादी की लड़ाई को सही दिशा में ले सकता है।विभाग प्रचारक बापू राव मोघे से बातचीत करने के बाद संघ कार्य में विश्वास और पक्का हुआ। एक शाखा में गटनायक का पद लेकर शुरू हुई जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भईया की संघ यात्रा। यह यात्रा साधारण नहीं थी। भौतिक शास्त्र के प्रतिभा शील विद्यार्थी होने के कारण अनेक नामी गिरामी वैज्ञानिको के निमंत्रण को अस्वीकार करना ,माता पिता जी के विवाह कर के गृहस्थ जीवन बिताने के आग्रह को त्याग, समाजिक जीवन जीने का चुनाव सब कुछ आसान नहीं था। परन्तु कठिन परिश्रम करते हुए कुशल संगठन कर्ता बन कर एक- एक सीढ़ी चढ़ते हुए सरसंघ चालक के पद को सुशोभित करने का सौभाग्य प्राप्त किया। इतना ही नहीं, लगभग ५८ वर्षो के सक्रिय सामाजिक जीवन में समाज में नए आदर्शो को स्थापित करने का श्रेय भी रज्जु भईया को प्राप्त है।
संघ कार्य के ७० वर्ष पूरे होने पर अपने एक भाषण में रज्जु भईया ने कहा था की अब देश में हिंदुत्व की विचार धारा के अनुकूल माहौल बनता दिख रहा है वायु मंडल के इस बदलाव के कारण हिन्दू हितों की चिंता करने वाली सरकार के लक्छण दिख रहे है। हिंदुत्व की इस बढ़ती लहर को देखते हुए राष्ट्र विरोधी शक्तियाँ घबड़ाई हुई है। लगभग २५ वर्षो के बाद मोदी सरकार के खिलाफ एक जुट विरोधियों की गतिविधियाँ उनकी कही हुई बात को सही सिद्ध कर रही है।
समाज में व्याप्त समस्याओं एवं विषमताओं के बारे में उनका बड़ा स्पष्ट मत था की सरकार या सरकारी कर्मचारी समाज-पर्रिवर्तन नहीं ला सकते। सरकार हमारे मार्ग में रोड़ा न बने और अनुकूल वातावरण बनाने में सहयोग करे हम इतनी ही अपेक्षा करते है। समाज परिवर्तन तो वयक्ति बदलने से होगा। डाक्टर जी ने व्यक्ति को संस्कार देने की संघ शाखा की अभिनव पद्धति निर्मित की। शाखा के कार्यक्रमों में हिन्दू समाज में समरसता , अनुशासन और चरित्र निर्माण होता है। संघ द्वारा चलाये जा रहे विद्यालयों में भी अच्छी पढाई के साथ अच्छे संस्कार प्राप्त होते है। यह बंधु समाज सेवा की भावना से ओत प्रोत होते है इसीलिए संघ की कार्य पद्धति पर सम्पूर्ण समाज का विश्वास बढ़ा है की इसमें से राष्ट्र सेवा के लिए संस्कारित व्यक्ति निर्मित किये जा सकते है। हमारी शाखाये बढे ,उनमे अधिक से अधिक संख्या हो और उसके कार्यक्रम अधिक संस्कारक्षम हो , यही आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हमारे समाज में अपूर्व सामर्थ्य है। उसे जगाने का कार्य करना होगा। समाज में ऐसी मनोवृति पैदा करनी होगी की समाज के सारे काम हमारे ही प्रयासों से संपन्न हो। आज समाज के सामर्थ्य को भुला दिया गया है। सबकुछ सरकार के भरोसे छोड़ दिया गया है जिसकी वजह से देश की दुर्दशा हुई है। इसलिए सोये हुए समाज की क्षमता को जगाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ताकि समाज अपनी जरूरतों के मुताबिक आवश्यक विद्यालयों का संचालन ,पीने का पानी , पर्यावरण ,सफाई इत्यादि की व्यस्था खुद करे और सरकार पर निर्भरता कम से कम हो।
अपने समाज में तीन ऋण माने गए है पितृ ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण। परिवार में माता पिता और अन्य वृद्ध लोगो के साथ सम्मान पूर्वक रह कर पितृ ऋण ,प्रकृती ,पर्यावरण,गऊ इत्यादि के बारे में जागरूकता और इसका आवश्यकता से अधिक दोहन न करने की आदत हमें देव ऋण से तथा सबकुछ समाज का है और समाज से ही लिया है तो समाज को वापस किया जाना चाहिए इस भाव से यदि जीवन जिया जाये तो हमें तीनो ऋणों से मुक्ति मिलती है। इस भाव को जगाना और इसी के अनुसार अपना जीवन जीना यही आदर्श जीवन शैली है।
आज संघ देश की सम्पूर्ण स्थिति बदलने के लिए लोगो को लगाने के लिए संकल्पित है और मातृभूमि के प्रति प्रेम की भावना जगाने का कार्य संघ निरंतर करता आ रहा है। हम ऐसा भारत बनाने के लिए कार्य रत है की भारत माता की जय हम ही नहीं पूरी दुनिया के लोग कहे। यही हमारी प्रतिज्ञा है। और जब तक यह प्राप्त न होगा हम तबतक शांत नहीं बैठ सकते।
रज्जू भईया का पूरा जीवन हम सभी स्वयंसेवकों के लिए आदर्श एवं प्रेरणादायी है। उनके द्वारा दिखाये गए मार्ग पर चल कर ही हम भारत को इसका पुराना गौरव वापस दिलवा सकते है। सन २०२२ यानि अब से तीन वर्षो के बाद रज्जू भईया की जन्म शताब्दी मनाने का अवसर हिंदू समाज को मिलने वाला है। इसकी तैयारी हम अभी शुरू कर रहे है। ताकि उनके विचारो को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पंहुचा सके। और उनके दिए मार्गदर्शन को समाज के सामने ला सके।
अजय सिंह
महा सचिव
प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भईया ) स्मृति संस्थान
इलाहबाद विश्वविद्यालय का एक मेधावी छात्र क्रन्तिकारी विचारों से प्रभावित हो कर १९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध को सहयोग करने के लिए कांग्रेस के द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के दिशा हीन हो जाने से निराश विकल्प की तलाश कर रहा था । इस बीच अपने एक मित्र शांता राम कलासकर के अनुरोध पर संघ के कार्यक्रम में सम्मलित हो कर उसके अनुशासन और कार्य पद्धति देखकर मन को दिलासा हुई और विश्वास जगा की यह संगठन आजादी की लड़ाई को सही दिशा में ले सकता है।विभाग प्रचारक बापू राव मोघे से बातचीत करने के बाद संघ कार्य में विश्वास और पक्का हुआ। एक शाखा में गटनायक का पद लेकर शुरू हुई जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भईया की संघ यात्रा। यह यात्रा साधारण नहीं थी। भौतिक शास्त्र के प्रतिभा शील विद्यार्थी होने के कारण अनेक नामी गिरामी वैज्ञानिको के निमंत्रण को अस्वीकार करना ,माता पिता जी के विवाह कर के गृहस्थ जीवन बिताने के आग्रह को त्याग, समाजिक जीवन जीने का चुनाव सब कुछ आसान नहीं था। परन्तु कठिन परिश्रम करते हुए कुशल संगठन कर्ता बन कर एक- एक सीढ़ी चढ़ते हुए सरसंघ चालक के पद को सुशोभित करने का सौभाग्य प्राप्त किया। इतना ही नहीं, लगभग ५८ वर्षो के सक्रिय सामाजिक जीवन में समाज में नए आदर्शो को स्थापित करने का श्रेय भी रज्जु भईया को प्राप्त है। संघ कार्य के ७० वर्ष पूरे होने पर अपने एक भाषण में रज्जु भईया ने कहा था की अब देश में हिंदुत्व की विचार धारा के अनुकूल माहौल बनता दिख रहा है वायु मंडल के इस बदलाव के कारण हिन्दू हितों की चिंता करने वाली सरकार के लक्छण दिख रहे है। हिंदुत्व की इस बढ़ती लहर को देखते हुए राष्ट्र विरोधी शक्तियाँ घबड़ाई हुई है। लगभग २५ वर्षो के बाद मोदी सरकार के खिलाफ एक जुट विरोधियों की गतिविधियाँ उनकी कही हुई बात को सही सिद्ध कर रही है।
समाज में व्याप्त समस्याओं एवं विषमताओं के बारे में उनका बड़ा स्पष्ट मत था की सरकार या सरकारी कर्मचारी समाज-पर्रिवर्तन नहीं ला सकते। सरकार हमारे मार्ग में रोड़ा न बने और अनुकूल वातावरण बनाने में सहयोग करे हम इतनी ही अपेक्षा करते है। समाज परिवर्तन तो वयक्ति बदलने से होगा। डाक्टर जी ने व्यक्ति को संस्कार देने की संघ शाखा की अभिनव पद्धति निर्मित की। शाखा के कार्यक्रमों में हिन्दू समाज में समरसता , अनुशासन और चरित्र निर्माण होता है। संघ द्वारा चलाये जा रहे विद्यालयों में भी अच्छी पढाई के साथ अच्छे संस्कार प्राप्त होते है। यह बंधु समाज सेवा की भावना से ओत प्रोत होते है इसीलिए संघ की कार्य पद्धति पर सम्पूर्ण समाज का विश्वास बढ़ा है की इसमें से राष्ट्र सेवा के लिए संस्कारित व्यक्ति निर्मित किये जा सकते है। हमारी शाखाये बढे ,उनमे अधिक से अधिक संख्या हो और उसके कार्यक्रम अधिक संस्कारक्षम हो , यही आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हमारे समाज में अपूर्व सामर्थ्य है। उसे जगाने का कार्य करना होगा। समाज में ऐसी मनोवृति पैदा करनी होगी की समाज के सारे काम हमारे ही प्रयासों से संपन्न हो। आज समाज के सामर्थ्य को भुला दिया गया है। सबकुछ सरकार के भरोसे छोड़ दिया गया है जिसकी वजह से देश की दुर्दशा हुई है। इसलिए सोये हुए समाज की क्षमता को जगाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ताकि समाज अपनी जरूरतों के मुताबिक आवश्यक विद्यालयों का संचालन ,पीने का पानी , पर्यावरण ,सफाई इत्यादि की व्यस्था खुद करे और सरकार पर निर्भरता कम से कम हो।
अपने समाज में तीन ऋण माने गए है पितृ ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण। परिवार में माता पिता और अन्य वृद्ध लोगो के साथ सम्मान पूर्वक रह कर पितृ ऋण ,प्रकृती ,पर्यावरण,गऊ इत्यादि के बारे में जागरूकता और इसका आवश्यकता से अधिक दोहन न करने की आदत हमें देव ऋण से तथा सबकुछ समाज का है और समाज से ही लिया है तो समाज को वापस किया जाना चाहिए इस भाव से यदि जीवन जिया जाये तो हमें तीनो ऋणों से मुक्ति मिलती है। इस भाव को जगाना और इसी के अनुसार अपना जीवन जीना यही आदर्श जीवन शैली है।
आज संघ देश की सम्पूर्ण स्थिति बदलने के लिए लोगो को लगाने के लिए संकल्पित है और मातृभूमि के प्रति प्रेम की भावना जगाने का कार्य संघ निरंतर करता आ रहा है। हम ऐसा भारत बनाने के लिए कार्य रत है की भारत माता की जय हम ही नहीं पूरी दुनिया के लोग कहे। यही हमारी प्रतिज्ञा है। और जब तक यह प्राप्त न होगा हम तबतक शांत नहीं बैठ सकते।
रज्जू भईया का पूरा जीवन हम सभी स्वयंसेवकों के लिए आदर्श एवं प्रेरणादायी है। उनके द्वारा दिखाये गए मार्ग पर चल कर ही हम भारत को इसका पुराना गौरव वापस दिलवा सकते है। सन २०२२ यानि अब से तीन वर्षो के बाद रज्जू भईया की जन्म शताब्दी मनाने का अवसर हिंदू समाज को मिलने वाला है। इसकी तैयारी हम अभी शुरू कर रहे है। ताकि उनके विचारो को ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पंहुचा सके। और उनके दिए मार्गदर्शन को समाज के सामने ला सके।
अजय सिंह
महा सचिव
प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भईया ) स्मृति संस्थान
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