Sunday, October 29, 2017

अभिनव भारत और किसान


किसान भारत की आत्मा है।  राष्ट्र की आधार भिंती और रीढ़ है। उसके ऊपर और उसके द्वारा ही अभिनव भारत का निर्माण किया जा सकता है।
लेकिन सबसे पहले प्रश्न यह आता है की जिस भारत का निर्माण करना चाहते है उसकी रूप रेखा क्या है ?क्या हम पश्चिमी जगत की नक़ल करके आर्थिक दृष्टि से संपन्न और तकनिकी क्षमताओ से समृद्धि आधुनिक दुनिया का विकसित राष्ट्र बनाना चाहते है ?आज की दुनिया में टिके रहने के लिए भौतिक दृष्टि से शक्तिशाली होना तो अनिवार्य है ही। लेकिन हमें अभिनव भारत का निर्माण करने इसके आगे कुछ करने की आवश्यकता है।  वह क्या है ?
सबसे पहले हमें अपनी अस्मिता को पहचानना होगा। हर राष्ट्र की अपनी वैयक्तिक विशेषता होती है उसके आधार पर ही वह अपना विकास कर सकता है।  दूसरों की नक़ल करके नहीं। भारत की अस्मिता का आधार आध्यात्मिकता है। इसकी पहचान हमारे ऋषियों ने बहुत पहले ही कर ली थी। इसी कारण इसके उत्थान पतन के साथ ही हमारे राष्ट्रीय जीवन का उत्थान पतन होता चला आया है।  इतिहास इसका साक्षी है।

इसी के आधार पर ही हमारी त्याग ,तपस्या और सेवा संस्कृति का निर्माण होगा जो समाज में स्नेह , सामंजस्य और सहयोग का वातावरण पैदा करेगी। जो की आज के युग की परम आवश्यकता है। नैतिकता तो आध्यात्मिक सत्य से इस तरह स्वतः स्फूर्ति होती है जैसे फूल में सुगन्धि। जो चीजे यानि शांति व्यस्था आज हमें समाज में स्थापित करने के लिए शक्ति का इस्तेमाल करना पड़ता है लेकिन वह फिर भी प्राप्त नहीं हो पाती, नैतिक आचरण होने से वह समाज में स्वतः स्थापित हो जाएगी। हमारी शिक्षा जो जीवन का निर्माण करने वाली व्यवस्था है उसका स्वरूप भी उपरोक्त दृष्टि कोण से ही स्थापित होगा। अर्थात हमारी शिक्षा बेहतर और श्रेष्ठ मानव बनाने की ओर लक्षित होगी न की मनुष्य को धन कमाने की मशीन बना कर उसका पतन करने की ओर। शिक्षा साधक और साधन के बीच स्वस्थ सम्बन्ध स्थापित करके राष्ट्रीय जीवन को उर्ध्व गति प्रदान करेगी। इसमें संख्यात्मक और परिणात्मक विकास के साथ जीवन के गुणात्मक विकास पर विशेष बल दिया जायेगा तभी हम महान राष्ट्र का निर्माण कर सकते है।

हमारे आदि पुरुषों द्वारा दिया गया वसुधैव कुटुम्ब्कम का आदर्श हमारे समाज निर्माण का सूत्र रहा है जिसने आदर्श ,प्रकृति और सहज जीवन का निर्माण किया है। इस आदर्श में पृथ्वी हमारा घर है और मानव जाती हमारा परिवार है। परिवार की तरह इसमें विभिन्नता तो होती है किन्तु असामनता नहीं अर्थात परिवार के सदस्यों की व्यक्तिगत योग्यताये अलग अलग होती है लेकिन उनके बीच में बड़ा - छोटा ,ऊँचा -नीचा का भेदभाव नहीं होता। सबके बीच में प्रेम पर आधारित एकता का सम्बन्ध होता है।
स्वतन्त्र राज्य में राजनैतिक हुकूमत का नहीं जनता की सेवा का तंत्र होता है। इसीलिए राजनीत में आने वाले जन प्रतिनिधियों में विनम्रता , सेवाभाव और जनता के प्रति कृतज्ञता का भाव होना आवश्यक है।  लेकिन दुर्भाग्य से हमारे अंदर वह विशालता और महानता नहीं आयी है। अभी हमारे स्वभाव में गुलामी की प्रवर्ती बानी हुई है। इसका परिष्कार करना होगा। यह अभिनव भारत की राज्य व्यवस्था होगी।

अभिनव भारत की अर्थव्यस्था भी आज की अर्थव्यस्था से क्रन्तिकारी रूप में भिन्न होगी। इसमें अर्थ जीवन के विकास का साधन होगा साध्य नहीं। मनुष्य पैसे का स्वामी होगा गुलाम नहीं। आर्थिक विकास का मॉडल प्रकृति के शोषण पर नहीं  अपित प्रकृति के सम्पोषण पर आधारित होगा। इस व्यस्था में मनुष्य और प्रकृति के बीच में
बेटे और माँ का प्रकृतिक सम्बन्ध होने के कारण दोनों एक -दूसरे को सम्पोषण करेंगे। इस प्रकार सम्पूर्ण जीवन और जगत में सामन्जस्य और सुव्यवस्था स्थापित होगी और आधुनिक दुर्व्यवस्था का संकट समाप्त हो जायेगा।

इस सप्त आयामी ब्लू प्रिंट  पर आधारित भारत या सात मंजिले भवन का ही नाम अभिनव भारत होगा। अब प्रश्न यह आता है की इसका निर्माण कौन करेगा ? मेरा उत्तर है की इस अभिनव भारत का निर्माण किसान और एक मात्र किसान ही कर सकता है।  मेरे इस आग्रह पूर्ण कथन के पीछे ठोस कारण  है जो इस प्रकार है :

१. किसान (ग्राम्य भारत का हर नागरिक जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेत से जुड़ा है किसान है )की संख्या भारत में लगभग ७० प्रतिशत है। अगर यह ७० प्रतिशत लोग एक साथ जुड़ कर संगठित हो जाते है तो किसान देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय  शक्ति बन जायेगा।  फिर यहराष्ट्रीय शक्ति देश का काया पलट कर सकती है। इसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।
२. किसान अपने कर्म और स्वभाव से पोषक है वह पूरे  राष्ट्र का पालन -पोषण करता है। बाकी सभी लोग उसकी कमाई पर आश्रित है और उसका शोषण भी करते है। वह एक पिता की भांति सब कुछ को सहनशीलता एवं उदारता पूर्वक स्वीकार करता रहता है।

३. किसान प्राकृतिक रूप से नैतिक होता है क्योंकि वह प्रकृति माता के आशीर्वाद से धरती की गोद से धन धान्य निकालता रहता है और सबको बाटता रहता है यानि वह सबको सबकुछ देता है और लेता किसी से कुछ नहीं।
इसीलिए किसान को देवता और धरती का भगवान तक कहा गया है।
४. किसान के अंदर   त्याग    सेवा  और राष्ट्र सेवा के लिए बलिदान करने का स्वाभाविक  गुण  है। वह नवनिर्माण के लिए जीवन की आहुति देने को तैयार है ( उसका बेटा ही सैनिक के रूप में राष्ट्र की अंतः एवं बाह्य रक्षा करता है )  भारत की आजादी के लिए महात्मा गाँधी के नेतृत्व में किसान ने ही अग्रणी भूमिका निभाई थी और वह किसान ही आज भी नए भारत का निर्माता बनेगा क्योकि वह अपना जीवन देकर नव-निर्माण करने की क्षमता रखता है।

५. हमारे ऋषियों ने खेती को ऋषि- कर्म और किसान को प्राकृतिक ऋषि कहा है। इसीलिए हमारी नियति और भविष्य किसान पर टिका हुआ है। इसलिए किसान जिस दिन जाग कर खड़ा हो जायेगा उसी दिन भारत का उदय हो जायेगा। भारत न केवल असली रूप में प्रकट हो जायेगा बल्कि मानव जाति का नैतिक अभिभावक बनकर पृथ्वी माता को गौरव प्रदान करेगा।


स्वामी ओम पूर्ण स्वतन्त्र





















Wednesday, April 5, 2017

व्यसायिक एवं तकनिकी शिक्षा की उपयोगिता एवं गुणवत्ता बढ़ाने के पांच सूत्र



दोस्तों,
देश की उन्नति के लिए तमाम चिंताओं में एक चिन्ता व्यसायिक एवं तकनिकी शिक्षा की उपयोगिता एवं गुणवत्ता बढ़ाने की है। समय -समय पर इस के लिए प्रदेश एवं केंद्र सरकार  के स्तर पर अनेक प्रयास हुए है इसमें कुछ सुधार भी हुआ है। अब तक जो हुआ है उसे और बेहतर करने हेतु निम्न सुझावों पर अमल करने से अच्छे परिणाम आ सकेंगे ऐसा मेरा विश्वास है :

१. पाठ्यक्रम उद्योगों की जरुरत पूरी करे :

  •  वर्तमान स्थिति :
              विश्वविदयालय  की विद्वत परिषद् में उद्योग के ज्यादातर  प्रतिनिधी होने वाली बैठको में व्यस्तता के कारण अनुपस्थित रहते है अतः उनके द्वारा दिया जाने वाला मार्गदर्शन प्रायः मिल नहीं पाता। प्रतिनिधियों का चुनाव उनकी ब्रांड वैल्यू के आधार पर अथवा व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर किया जाता है। ज्यादातर प्रतिनिधी  अपनी सामजिक जिम्मेदारी और उसके पूरा न होने से समाज के  नुकसान के बारे में उदासीन रहते है।  जिम्मेदारी स्वीकार करने का कारण व्यक्तिगत और संस्थागत ब्रांड वैल्यू बढ़ाने का होता है। उसके पूरा न होने पर किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता इसलिए लोग पद स्वीकार करते है और समय की कमी का बहाना  बना उससे बचते रहते है।

  • क्या करे  :  
        विद्वत परिषद् में चयन उनलोगों का हो जो  उद्यमी हो और सामाजिक सरोकार जिनके जीवन का हिस्सा हो जो उसे रोज जीते हो। इस सम्बन्ध में खुला विज्ञापन दे कर  निमंत्रित किया जाये। चयन समिति के लोग भी विद्वान् होने के साथ सेवाव्रती हो ताकि उनका किया चुनाव उद्देश्य की पूर्ति कर सके। प्रतिनधियों की कम्पनियो  के नाम विश्वविद्यालय परिसर एवं वेब साइट पर प्रदर्शित हो और प्रतिनिधियों के योगदान की सराहना बार बार की जाये।
ऐसे उदयमो जिनके प्रतिनिधि अच्छा प्रदर्शन कर रहे हो उन्हें सरकारी कामो में कुछ रियायतें  भी दी जा सकती है। जैसे जमीन, बिजली इत्यादि में छूट अथवा अन्य प्रकार का लाभ दिया जा सकता है।

२ . अध्यापको  को योग्य बनाना :
  •  वर्तमान स्थिति :
         आमतौर पर व्यसायिक एवं तकनिकी शिक्षा देने के लिए आने वाले अध्यापक किसी बेहतर विकल्प के न होने के कारण शिक्षक बनने  का निर्णय करते है। अच्छे शिक्षक बनाने के लिए विषय की जानकारी के अलावा स्वप्रेरणा का अभाव ,पढ़ाने की आधुनिक तकनीक का प्रयोग न करना ,उद्योगों के साथ लगातार संपर्क न रखना एवं विद्यार्थियों के साथ ठीक सम्वाद स्थापित न कर पाने  के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते है।

  •  क्या करे  :  
               बीस से पच्चीस प्रतिशत अध्यापक उद्योगों से पढ़ाने के प्रतिनियुक्ति पर आये तो उद्योग एवं शिक्षण संस्थान का लगातार संपर्क रहेगा। उद्योगों में आने वाले परिवर्तन अथवा नयी मांग के अनुसार पाठ्यक्रम में आवश्यक परिवर्तन करना संभव हो सकेगा। उद्योगों में काम करने वाले लोगो की और शिक्षण संस्थाओ में काम करने वाले लोगो के वेतन में अंतर को उद्योग अपने सी एस आर फंड्स से पूरा कर सकते है। अथवा उद्योगों के लिए अनुसंधान शिक्षण संस्थाओ में हो और प्रति नियुक्ति पर आये हुये लोग अनुसन्धान के प्रबंधन का काम भी करे तो उद्योग अतरिक्त ख़र्च को अपने वार्षिक लाभ हानि के साथ समाहित कर सकेंगे.

   अन्य अध्यापको के लिए छै माह में तीन-पाँच दिन की आवश्यक ट्रेनिंग की व्यवस्था हो जो उसके विषय के अतरिक्त अन्य कुशलताओं के लिए हो।

३. विद्यार्थियों की योग्यता एवं झुकाव का आकलन :
  •  वर्तमान स्थिति :
         किसी विषय में प्रवेश  अभी  प्रवेश परीक्षा का प्राविधान है इसको पास करने से योग्यता के अनुसार कालेज में चयन होता है। लेकिन इसके बाद सिवाय  विद्यार्थी अपनी रूचि के अनुसार विशेष योग्यता का विषय चुन सके  और कोई तरीका नहीं है।  ज्यादातर केस में विषय रुचि के बजाय या तो माता पिता ,बड़े भाई- बहन,मित्र या परिवार में चल रहे व्यापार की जरूरतों को ध्यान में रख कर विषय का चुनाव होता है। बहुत से उद्धरण ऐसे है जिनमे माता पिता डॉक्टर होने के कारण  बच्चे को डॉक्टर ही बनाना चाहते है जबकि बच्चे में इस विषय के लिए न तो योग्यता होती है न रूचि। परिणाम स्वरुप बच्चा विषय में प्रवेश लेकर भी कुछ खास उपलब्धि नहीं करता इस कारण कई बार तो आत्महत्या तक की नौबत आ जाती जाती है। भारत  का दुनिया के देशो की लिस्ट में प्रसन्नता सूचकांक २०१६ के अनुसार १७० वा नंबर है इसकी एक वजह व्यक्ति का अपनी योग्यता  एवम रूचि के स्थान पर न पहुँच  पाना भी है।

  •  क्या करे  :    
            अब टेक्नोलॉजी के द्वारा इसका समाधान उपलब्ध है। १२हवी कक्षा की परीक्षा के साथ ही झुकाव का ज्ञान होना विद्यार्थी, अभिभावक एवं समाज के लिए बहुत उपयोगी होगा। अतः इसका प्रबंध करना चाहिये। तत्पश्चात व्यसायिक प्रवेश परीक्षा के बाद जब प्रवेश मिलजाए तो फिर प्रतिवर्ष रुचि जानने का प्रबंध करने से विद्यार्थी की पूरी क्षमता का विकास भी होगा और उसकी प्रतिभा का लाभ व्यक्तिगत एवं  समाज को मिल सकेगा। धीरे धीरे योग्य व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार व्यसायिक स्थानों पर पहुच कर अचंभित करने वाले कार्य कर सकेंगे।  ऐसे टेस्ट जो रुचियों को बता सके और व्यक्तिगत क्षमताओ का सही आकलन कर के दिशा दे सके अब देश में उपलब्ध है और इनका व्यापक प्रयोग किये जाने की जरुरत है।
       
         इस विधा का उपयोग यदि और अधिक आक्रमकता के अनुसार नियोजित करे तो यह टेस्ट २-३ साल की आयु से शुरू होकर हर तीन साल पर होने चाहिये। यह बच्चों की रूचि और योग्यता के अनुसार अवसरों के उपयोग करना सुनिश्चित करेगा। इससे बच्चो के भविष्य की दिशा शुरू से निश्चित हो सकेगी और उस पर ठीक से काम हो तो इंजीनियरिंग ,मेडिकल ही नहीं ओलम्पिक के लिए भी प्रतिभा की खोज करना सम्भव होगा और १५-२० वर्षो के बाद की विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में देश अपना स्थान बनाने में सफल हो सकेगा।


 ४ . देश सेवा के लिए विशेष प्रशिक्षण :


  •  वर्तमान स्थिति :
                 वर्तमान में एन सी सी और एन एस एस जैसी ट्रेनिंग कुछ स्कूल एवं कालेजों  में करवाई जा रही है। यह अनिवार्य न होकर ऐच्छिक है।  इसको करने वाले बच्चों को कही -कही वरीयता भी मिलती है , लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। 

  •  क्या करे  :    
            सरकारी अध्यादेश निकाल कर जो लोग सरकारी नौकरी में जान चाहते है उनके लिए कम से कम तीन माह की ट्रेनिंग किसी आर्मी की ट्रेनिंग जैसी करवानी चाहिये जो इनकी दिमागी स्थित को मैं , मेरा, मुझे से हटा कर देश और समाज की समझ एवं हम उसका हिस्सा है इसलिए इससे केवल लेने की बात न सोच कर मुझे देश समाज को कुछ देना चाहिये इस विचार को मन में जगह दे सके तो वर्तमान नजरिये में परिवर्तन संभव हो सकता है। इसके शुभ परिणाम ३-५ वर्षो में आने की सम्भावना रहेगी।
  
५.  स्थानीय उद्यमों में रूचि  उत्पन्न करना :  
  •  वर्तमान स्थिति : 
             व्यसायिक एवं तकनिकी शिक्षा को पूरा करने के लिए तीन से छै माह का प्रशिक्षण किसी उद्यम अथवा व्यसायिक प्रतिष्ठान में जा कर करना होता है। वस्तुस्थित यह है की ज्यादातर बच्चे तो बिना वहा गए ही सर्टीफिकेट प्राप्त करलेने की कोशिश करते है।  कुछ लोगो ने इसे व्यसाय बना लिया है जो फ़ीस लेकर कुछ सीखा देते है और इससे परीक्षा की आवश्यकता पूर्ति हो जाती है। परन्तु जिस कारण से यह नियम पूर्व में बनाया गया था उस उद्देश्य की पूर्ति न हो कर महज खाना पूर्ति होती है। 
 
 व्यसायिक प्रतिष्ठान  भी इसमें बहुत ज्यादा रुच नहीं दिखते है क्योकिं उन्हें पता है की इस सामाजिक दाईत्व को पूरा न करने का न तो कोई सामाजिक प्रतिष्ठा पर और न ही आर्थिक लाभ पर कोई असर पड़ने वाला है इसलिये इसको अनदेखा करने की प्रवृत्ति रहती है। 
 
  • क्या करे  :  
           विद्यार्थियों एवं अध्यापको के लिए यह आवश्यक हो की पूरे पाठ्यक्रम की अवधि में एक बार टीम माह अथवा छै माह के स्थान पर हर  साल कम से कम  छै से आठ सप्ताह किसी एक उद्यम अथवा प्रतिष्टान से जुड़ना अनिवार्य हो। और जुड़ने से उद्यम को गुणवत्ता  अथवा वित्तीय स्थित में की सुधार हुआ अथवा तकनीक सुधार इत्यादि का लाभ सुनिश्चित करना चाहिए तो काम करने वाले विद्यार्थियों और अध्यापको एवं उद्यम तीनो के लिए लाभ की स्थित बन सकती है और इसमें उनकी रूचि सुनिश्चित  हो जाएगी. यह स्थानीय कालेजों के द्वारा स्थानीय उद्यमों के लिए हो तो अपने पास की चीजों की परवाह करने का मनोभाव बनेगा।  और केवल जहाँ है वहां की परवाह न करने की आदत से छुटकारा मिलेगा। फाइनल परीक्षा में उद्यम से जुड़े हुए व्यसाइयों के द्वारा दी गई राय एवं अंक को ५०% वेटेज दिया जाने से विद्यार्थी ,अध्यापक एवं उद्यम तीनो संजीदा रहेंगे और जिम्मेदारी का एहसास होगा।
 
  इस तरह से उद्यम को होने वाले अतरिक्त आय में इन विद्यार्थियों एवं अध्यापको पर होने वाले व्यय को समाहित किया जा सकता है ताकि उनपर अतरिक्त आर्थिक बोझ का नुकसान न हो।  आवशयक होने पर कार्य कर रहे अध्यापको के अलावा अवकाश प्राप्त लोगो का सहयोग लेने से उनके लिए भी समाज में अपने योगदान का फक्र होगा व्यस्त रहने से स्वस्थ एवं मानसिक स्थित भी बेहतर रहेगी।