Friday, May 25, 2018

मोदी के चार साल ,क्या है जनता का हाल

दोस्तों ,

देखते ही देखते मोदी सरकार के चार साल निकल गए और नये चुनावोँ  की दस्तक सुनाई देने लग गई है । पुराने खिलाडी नयी योजनाओं के साथ खेलने को तैयार हो रहे है। पिछली बार मोदी जी गुजरात से केंद्र में आये थे तो उनके व्यक्तित्व  के बारे में,सोचने और काम करने के तरीकों का  ज्यादा कुछ पता नहीं था। केवल एक बात जो जनता जानती थी वह था गुजरात में हुये दंगे और उनसे मोदी जी कैसे निपटे।  फिर समय समय हुए पर कुछ कोर्ट केस और उनके निर्णयों के बारे में राष्ट्रीय अख़बार और टीवी चैनलों के माध्यम से मिली सीमित जानकारी के आधार पर मोदी जी के बारे में जन भावना का निर्माण हुआ । क्योकि राष्ट्रीय स्तर पर खास जानकारी नहीं थी तो इसका  स्वाभाविक लाभ मोदी जी को मिला और अभूतपूर्व विजय श्री मोदी जी के नेतृत्व में  भाजपा को  प्राप्त हुई और पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बन गयी।   चारो और देश में ऐसा माहौल बना  मानो जनता की वर्षो पुरानी  मुराद पूरी हुई।  कुछ को लगा की बस अब तो रामराज्य आने वाला है इसलिए चाहे राम मंदिर निर्माण हो या पाकिस्तान से दो दो हाथ कर हिसाब चुकता करना हो सब सम्भव हो जायेगा। मोदी जी ने चुनाव में वह सारे वादे कर दिए जिनका जरा भी असर वोट पर पड़ने वाला था या पड़ सकता था। मसलन रोजगार ,बैंक एकाउंट में पैसे,सबका  साथ सबका  विकास इत्यादि इत्यादि। हालांकि मोदी जी को पता था की इतने वादे पूरे करना संभव नहीं फिर भी करो या मरो की  तर्ज इलेक्शन जितना ही एक मात्र उद्देश्य है इसलिए वादे करते चले गए।  और नतीजा अच्छा रहा।

मोदी जी के लाल किले पर दिए गए पहले भाषण से ही ऐसा लगा की देश की जनता की सभी मांगे धीरे -धीरे पूरी होनी शुरू हो जाएँगी। स्वछता अभियान, पाकिस्तान से दोस्ती ,अमरीका से लगा कर यु के  तथा अन्य महाशक्तियों के लोगो से मोदी जी दोस्ती गणतंत्र दिवस पर बराक ओबामा का दिल्ली आना सब कुछ बहुत जोरदार रहा। लेकिन उसी समय से विरोधिओं ने भी अपने ढंग से कमान सम्भाली और शुरू हुआ पुरुस्कार लौटने का सिलसिला। पक्ष और विपक्ष दोनों तरफ से खूब शोर मचा।  तमाम योजनाओ का शुभारम्भ किया गया। कांग्रेस सरकार राज्यों में हुए चुनावों में ेके के बाद एक हारती चली गयी। तो कभी इ वी एम् मशीन को दोष दिया गया कभी हिन्दू मुस्लिम कार्ड  खेला गया।    कुल मिला कर आशा निराशा से भरा पहला साल ख़तम हुआ।

दूसरे साल में भी पुरानी घटनाओं  के साथ मामला भारत विरोधी गतिविधियो की और बढ़ा इसमें जे एन यू की घटनाये    सबसे ज्यादा चर्चा में रही।  लेकिन यू पी और बिहार चुनाव के पहले नोट बंदी ने लोगो को हिला के रख दिया। आम आदमी जिसने दुःख सुख को एक जैसा मान कर जीने की आदत डाल ली थी और मान लिया था की सरकारे अमीरो के हित  में काम करती है एक नयी राह  दिख गयी और ऐसा लगा की मोदी सरकार अमीरो के खिलाफ भी कुछ कर सकती है। इसके पहले इंदिरा गाँधी ने जब बैंको का सरकारी करण किया था तो भी कुछ ऐसा महसूस हुआ था लेकिन उस घटना से प्रभावित होने वाले लोग काम थे। नोट बन्दी  ने तो गरीबो और अमीरों दोनों को हिला दिया लेकिन देश ने इसे काले धन के   खिलाफ एक बड़ी जंग मान कर सरका का भरपूर समर्थन किया।

एक देश एक टैक्स का नारा देकर मोदी सरकार ने पुरे देश में एक टैक्ससिस्टम लागू किया जी एस टी के माध्यम से।  और इसने एक बार फिर देश में व्यापार करने के ढंग को बदला और काले धन तथा टैक्स की चोरी को प्रभावित किया। धीरे धीरे देश की गाड़ी नयी पटरी पर चलने को तैयार हो गई। पुरानी सोच बदली और यह देश हमारा है हमें भी इसके लिए कुछ करना चाहिए का भाव जनता में आना शुरू हो गया। हालांकि इसमें सबकुछ ठीक हो गया कहना मुश्किल है लेकिन फिर भी चीजे बदली है और यह बदलाव देश से लगा कर विदेशो तक और विदेश में रह रहे भारतीयों ने भी महसूस किया। ब्रांड भारत दिखने लगा ,आर्थिक मोर्चे पर अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी जैसे स्टैण्डर्ड एंड पुअर इत्यादि ने अ
च्छी रैंकिग दी।














और अंत में 





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